संविधान पीठ ने उठाए अहम सवाल
राज्यपाल और राज्य सरकारों के बीच बढ़ते विवाद को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने अहम टिप्पणी की है। बुधवार, 20 अगस्त को सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश (CJI) बी.आर. गवई की अगुवाई वाली पांच जजों की संविधान पीठ ने सवाल किया कि क्या एक लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गई सरकार राज्यपाल की “इच्छा और मनमर्जी” पर निर्भर रह सकती है?
राष्ट्रपति ने भी जताई थी चिंता
यह मामला उस समय चर्चा में आया जब राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने सुप्रीम कोर्ट से पूछा था कि क्या गवर्नर और राष्ट्रपति को विधानसभा से पारित बिल पर फैसला लेने के लिए कोई समय-सीमा तय की जा सकती है। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट की दो जजों की बेंच ने विधेयकों की मंजूरी के लिए समयसीमा तय की थी।
आर्टिकल-200 पर बहस
केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल (SG) तुषार मेहता ने दलील दी कि संविधान के अनुच्छेद 200 में गवर्नर को चार विकल्प दिए गए हैं—
- विधेयक को मंजूरी देना
- असहमति जताना या मंजूरी रोकना
- राष्ट्रपति के विचारों के लिए सुरक्षित रखना
- विधानसभा को पुनर्विचार के लिए लौटाना
SG के अनुसार, अगर गवर्नर असहमति जताते हैं तो विधेयक वहीं “समाप्त” हो जाता है और उसे वापस भेजना जरूरी नहीं।
CJI गवई ने इस दलील पर सवाल उठाते हुए कहा कि अगर गवर्नर को विधेयक को अनिश्चित काल तक रोकने का अधिकार मिल गया तो क्या यह लोकतांत्रिक व्यवस्था के खिलाफ नहीं होगा? उन्होंने कहा कि इसका मतलब यह होगा कि बहुमत से चुनी गई सरकार गवर्नर की इच्छा पर निर्भर हो जाएगी।
राज्यपाल की भूमिका पर बहस
सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि राज्यपाल केवल “डाकिया” नहीं हैं, बल्कि भारत सरकार और राष्ट्रपति के प्रतिनिधि हैं। वहीं न्यायाधीशों ने साफ किया कि अगर राज्यपाल सिर्फ एक बार असहमति जता कर प्रक्रिया खत्म कर देंगे तो यह राजनीतिक प्रक्रिया को नुकसान पहुंचाएगा।
जस्टिस नरसिम्हा ने टिप्पणी की कि विधेयक को वापस भेजने और उसमें सुधार कराने का विकल्प खुला रहना चाहिए, ताकि यह प्रक्रिया “ओपन-एंडेड” बनी रहे।

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