रीजनल रिपोर्टर

सरोकारों से साक्षात्कार

पापा… मेरी छोटी-सी दुनिया के सबसे बड़े हीरो

विनोद बडोनी

त्रेपन सिंह चौहान को गये आज पाँच वर्ष हो गये हैं। उम्र में वह हम से बहुत छोटा था, मगर कद में बहुत बड़ा। डॉ. शमशेर सिंह बिष्ट के जाने के महज दो साल के बाद त्रेपन के भी चले जाने से जनांदोलनों में जो रिक्ति पैदा हुईं, वह भर नहीं पायी।

उनके असमय जाने से न सिर्फ उसका उपन्यास ‘ललावेद’ अधूरा रह गया, जिसकी प्रतीक्षा ‘यमुना’ और ‘हे ब्वारी’ के मुग्ध पाठक कर रहे थे, बल्कि ‘घस्यारी प्रतियोगिता’ का शानदार सिलसिला भी टूट गया।

अलबत्ता उसके द्वारा गठित ‘उत्तराखंड निर्माण मजदूर संघ’ का जिम्मा उसके साथी शंकर गोपालाकृष्णन ने बखूबी सम्हाल ली है।

उनके साथी विनोद बडोनी ने उनके बेटे अक्षत के साथ मुलाक़ात की। विनोद लिखते हैं :

“हाल ही में उनके पुत्र अक्षत चौहान से एक छोटी-सी मुलाक़ात हुई। बातों-बातों में पापा की चर्चा चली और जो सुना, वह दिल के सबसे गहरे कोने तक उतर गया। बहुत कुछ कहना चाहता था अक्षत, पर उस समय मेरी हिम्मत नहीं हुई और बात करने की।

अब, इस पुण्यतिथि पर वो सब साझा कर रहा हूँ, जो मन को बार-बार भिगा देता है। शायद फिर कभी बैठकर पूरी बात हो सके…

“पापा… मेरी छोटी-सी दुनिया के सबसे बड़े हीरो” (एक बेटे की आत्मा से निकली श्रद्धांजलि)

2016 — वो साल जिसने मेरी जिंदगी की दिशा ही बदल दी।

पापा को MND घोषित कर दिया गया था।

धीरे-धीरे उनके हाथों ने काम करना बंद कर दिया।

ना कपड़े पहन पाते,

ना शेविंग कर पाते,

ना कोई सामान उठा पाते।

मैं छोटा था —

बचपन में शरारत भी करता,

पर उसी शरारत में उनकी मदद कर देना

मेरे लिए जैसे प्यार जताने का तरीका था।

कभी कपड़े पहनाता,

कभी दवाइयाँ देता,

कभी उनका कांपता हाथ थाम लेता।

2017 — मेरी ज़िंदगी का सबसे खूबसूरत साल।

11 साल की उम्र में पहली बार पापा को हर दिन अपने साथ पाया।

उससे पहले हॉस्टल की दुनिया में कैद था,

जहाँ महीने में एक बार उनकी आवाज़ सुन पाता,

या कभी-कभार छोटी सी मुलाक़ात हो पाती।

लेकिन 2017 में सब बदल गया।

मैं हॉस्टल छोड़कर घर आ गया,

और पापा के साथ रहने लगा।

हर दिन, हर पल— बस पापा और मैं।

हमने खूब मस्ती की।

पापा एक गेम भी खेलते थे —

हर काम के पॉइंट मिलते थे,

और सप्ताह के अंत में उन्हीं पॉइंट्स के हिसाब से पॉकेट मनी।

काम कराना भी, और खेल-खेल में सिखाना भी —

यही पापा का अंदाज़ था।

वो खुद खाना नहीं बना सकते थे,

पर मेरी पसंद का खाना लाकर देते।

मैं जो भी मांगता,

वो बिना किसी शिकन के मुस्कुराकर कहते —

“हाँ बेटा।”

2018— पापा गिर पड़े,

और जैसे ज़िंदगी ने करवट बदल ली।

जो मेरी ढाल थे,

वो अब खुद एक सहारा चाहते थे।

और मैं, एक छोटा बच्चा होकर भी,

उनके लिए मजबूत बनने की कोशिश करता।

लेकिन इस सबके बीच

सबसे कीमती था उनका वो संदेश,

जो आज भी मेरे जीवन का मूल मंत्र है —

“पैसा किसी भी तरह से कमा लोगे,

कम आएगा या ज़्यादा— इससे पहचान नहीं बनेगी।

असली पहचान तब बनेगी, जब तुम इंसानियत नहीं खोओगे।

हालात जैसे भी हों,

अपनी इंसानियत को कभी गिरने मत देना।”

आज जब पापा हमारे बीच नहीं हैं,

तो उनकी बातें, उनकी सीख,

मेरे हर फैसले और सोच का हिस्सा हैं।”

मैं भी मिला था अभी 18 जुलाई को अक्षत से, एक फ़्रस्टेट करने वाला मुकदमा लड़ रही उसकी माँ नीमा से और उसकी छोटी बहन से, जो बहुत प्यारी-प्यारी कवितायें लिख रही है।

हम तुम्हारा अक्स तुम्हारी संतति में देख रहे हैं त्रेपन। तुम्हारी पुण्यतिथि पर आज तुम्हें अपनी अश्रुपूर्ण श्रद्धांजलि देते हैं।

https://regionalreporter.in/cleanliness-drive-started-in-srinagar-municipal-corporation/
https://youtu.be/DOr9xIQE7b8?si=99WlKppD2dC24xYs
Website |  + posts

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: