आज से प्रयागराज में महाकुंभ की शुरुआत हो गई है। महाकुंभ का आयोजन हर 12 सालों बाद किया जाता है। महाकुंभ सनातन धर्म का सबसे बड़ा धार्मिक और आध्यात्मिक पर्व है।
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विपरीत विचारों, मतों, संस्कृतियों, परंपराओं स्वरूपों का गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती की त्रिवेणी के तट पर महामिलन 45 दिन तक चलेगा। इस अमृतमयी महाकुंभ में देश-दुनिया से 45 करोड़ श्रद्धालुओं, संतों-भक्तों, कल्पवासियों और अतिथियों के डुबकी लगाने का अनुमान है।
144 साल बाद दुर्लभ संयोग में रविवार की आधी रात संगम पर पौष पूर्णिमा की प्रथम डुबकी के साथ महाकुंभ का शुभारंभ हो गया। गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती की त्रिवेणी के तट पर महामिलन 45 दिन तक चलेगा।
14 फरवरी को होगा पहला अमृत स्नान
राज्य सरकार के तरफ से तमाम हाईटेक कैमरा लगाए गए हैं। जो स्नान कर रहे हैं श्रद्धालुओं का हेड काउंट करते हैं। इससे एग्जैक्ट फिगर श्रद्धालुओं का निकाल कर सामने आ जाता है कि किस दिन कितने श्रद्धालु संगम में महाकुंभ पर्व के दौरान आस्था की डुबकी लगाये हैं।
आज आम आदमी यानी केवल श्रद्धालु आस्था की डुबकी संगम में लगा रहे हैं जबकि कल 14 फरवरी को मकर संक्रांति स्नान है यानी पहली अमृत स्नान है। अमृत स्नान को पहले शाही स्नान के तौर पर जाना जाता था। लेकिन, साधु संतों की मांग पर शाही स्नान का नाम बदलकर अमृत स्नान कर दिया गया है।

कैसे लगता है महाकुंभ का मेला
इस महाकुम्भ का आयोजन तिथि के अनुसार नहीं मनाया जाता है। यह मेला खगोलीय ग्रहों के चाल के अनुसार इसका दिन और तिथि का रखा जाता है।
देवगुरु वृहस्पति और सूर्य की स्थति पर निर्भर करता है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार जब वृहस्पति वृष राशि में रहते है और शनि कुम्भ राशि में ,सूर्य मकर राशि हो तब महाकुम्भ लगता है मेले में स्नान दान का विशेष महत्व है।
महाकुंभ में भारत के कई जगह से आए साधु संत सबसे पहले स्नान करते है फिर आम श्रद्धालु स्नान करते है।
कब से आरंभ होगा महाकुंभ
महाकुम्भ मेले का आरंभ आज 13 जनवरी 2025 दिन सोमवार से हो चुका है और इसका समापन 26 फरवरी 2025 महाशिवरात्रि के दिन होगा।
संगम पर महाकुंभ की सदियों पुरानी परंपरा
महाकुंभ कब से शुरू हुआ, इस संबंध में कुछ भी लिखित प्रमाण नहीं है। हालांकि, इस मेले का सबसे पहला लिखित प्रमाण बौद्ध तीर्थयात्री ह्वेनसांग के लेख में मिलता है।
उन्होंने छठवीं शताब्दी में सम्राट हर्षवर्धन के शासनकाल में होने वाले कुंभ मेले का वर्णन किया है। वहीं, ईसा से 400 वर्ष पूर्व सम्राट चंद्रगुप्त के दरबार में आए एक यूनानी दूत ने भी ऐसे ही मेले का जिक्र अपने लेख में किया है।
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