आज मकर संक्रांति के अवसर पर उत्तराखंड भर में उत्तरायणी पर्व श्रद्धा, उल्लास और लोकपरंपराओं के साथ मनाया जा रहा है।
कुमाऊं अंचल में यह पर्व घुघुतिया के नाम से विशेष लोकप्रिय है,
जहां बच्चे घुघुत (विशेष पकवान) बनाकर कौओं को आमंत्रित करते हैं।
“काले कौवा आ ले, घुघुति माला खा ले” की गूंज कभी गांवों से लेकर शहरों और प्रवासी उत्तराखंडियों के घरों तक सुनाई देती रही है।
कुमाऊं में घुघुतिया की अनोखी परंपरा
घुघुतिया पर्व पर मकर संक्रांति की शाम घुघुत बनाए जाते हैं और अगले दिन बच्चे इन्हें माला में पिरोकर कौओं को खिलाते हैं।
यह परंपरा केवल एक लोकाचार नहीं, बल्कि प्रकृति और जीव-जंतुओं के साथ सहअस्तित्व
का प्रतीक मानी जाती है। कुमाऊं क्षेत्र में यह पर्व पीढ़ियों से सामूहिक उल्लास के साथ मनाया जाता रहा है।
उत्तरायणी का धार्मिक महत्व और बागेश्वर मेला
उत्तरायणी पर्व का गहरा धार्मिक महत्व है। मान्यता है कि इस दिन पवित्र नदियों में स्नान कर
सूर्य को अर्घ्य देने से पुण्य की प्राप्ति होती है।
कुमाऊं के बागेश्वर में प्रतिवर्ष उत्तरायणी मेले का आयोजन होता है, जो एक सप्ताह तक चलता है।
यहां दूर-दूर से श्रद्धालु पहुंचते हैं और पवित्र स्नान, दान और पूजा-अर्चना करते हैं।
पौराणिक कथा: बागेश्वर नाम की उत्पत्ति
पौराणिक मान्यता के अनुसार, अयोध्या में प्रभु श्रीराम के राजतिलक के समय ब्रह्मा,
भगवान विष्णु की मानस पुत्री सरयू देवी को साथ लेकर जा रहे थे।
मार्ग में मार्कण्डेय ऋषि के आश्रम के निकट लीला रची गई, जिसमें भगवान शिव ने व्याघ्र रूप धारण किया।
बाद में उसी स्थान पर व्याघ्रेश्वर महादेव की स्थापना हुई और कालांतर में यह स्थान बागेश्वर कहलाया।
यहां गोमती नदी तथा मान्यता अनुसार लुप्त सरस्वती का संगम भी माना जाता है।
घुघुतिया की लोककथा
घुघुतिया पर्व से जुड़ी एक लोकप्रिय लोककथा कुमाऊं के राजा कल्याण चंद
और उनके पुत्र निर्भय चंद (घुघुतिया) से संबंधित है।
कथा के अनुसार, कौवों ने राजकुमार की प्राणरक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
इसी उपलक्ष्य में कौवों के सम्मान और कृतज्ञता के रूप में घुघुतिया पर्व मनाने की परंपरा शुरू हुई, जो उत्तरायणी के साथ जुड़ गई।
गढ़वाल में खिचड़ी संक्रांति
गढ़वाल अंचल में मकर संक्रांति को खिचड़ी संक्रांति के रूप में मनाया जाता है।
इस दिन प्रातःकाल स्नान कर सूर्योपासना की जाती है और खिचड़ी का दान पुण्यकारी माना जाता है।
यह पर्व पूरे उत्तराखंड में सांस्कृतिक एकता का प्रतीक है।
प्रवासी उत्तराखंडियों की उत्तरायणी कैथीग
उत्तराखंड के बाहर भी उत्तरायणी पर्व की सांस्कृतिक छटा देखने को मिलती है।
लखनऊ और बरेली में पर्वतीय प्रवासी संगठनों द्वारा भव्य आयोजन किए जाते हैं।
लखनऊ में पर्वतीय महापरिषद के नेतृत्व में महानगर रामलीला ग्राउंड से लेकर
गोमती तट स्थित पंडित गोविंद बल्लभ पंत सांस्कृतिक उपवन तक शोभायात्रा के साथ उत्तरायणी कैथीग का आयोजन किया जाता है।
इस वर्ष संस्था के रजत जयंती वर्ष के अवसर पर यह कैथीग 15 दिवसीय (14 से 28 जनवरी 2026) होगी,
जिसमें उत्तराखंडी खान-पान, जड़ी-बूटियां, हस्तशिल्प, आभूषण और लोकनृत्य-लोकगीत आकर्षण का केंद्र रहेंगे।
















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