484 गांवों की महापंचायत का बड़ा फैसला
समिति के स्थगन निर्णय का विरोध, हिमालय के महाकुंभ को लेकर जनआस्था का प्रदर्शन
हिमालय का महाकुंभ कही जाने वाली नंदा राजजात यात्रा को लेकर बड़ा फैसला सामने आया है।
नंदा देवी राजजात समिति द्वारा यात्रा एक वर्ष के लिए स्थगित किए जाने के
ऐलान के बाद मचे हड़कंप के बीच, 484 गांवों की महापंचायत ने इस निर्णय को सिरे से खारिज कर दिया है।
महापंचायत ने साफ कहा कि नंदा राजजात यात्रा इसी वर्ष संपन्न कराई जाएगी।
महापंचायत में लिया गया अहम निर्णय
यात्रा स्थगन के ऐलान के ठीक अगले दिन बुलाई गई महापंचायत में कुमाऊं
और गढ़वाल दोनों मंडलों से जुड़े गांवों के प्रतिनिधि शामिल हुए।
बैठक में सर्वसम्मति से निर्णय लिया गया कि सदियों पुरानी परंपरा के अनुसार राजजात यात्रा इस वर्ष ही निकाली जाएगी।
इसी दौरान मां नंदा देवी सिद्धपीठ मंदिर कुरुड़ आयोजन समिति का गठन किया गया,
जिसमें कर्नल (सेनि.) हरेंद्र सिंह रावत को अध्यक्ष चुना गया।
यह भी तय किया गया कि 23 जनवरी, वसंत पंचमी के शुभ अवसर
पर बड़ी जात का मुहूर्त निकाला जाएगा और यात्रा को भव्य रूप से संचालित किया जाएगा।
स्थगन के पीछे क्या थे कारण
नंदा देवी राजजात समिति ने यात्रा स्थगित करने के पीछे सितंबर 2026 में उच्च हिमालयी क्षेत्रों में
संभावित बर्फबारी और श्रद्धालुओं की सुरक्षा को कारण बताया था।
साथ ही, कुरुड़ और नौटी से नंदा राजजात व नंदा जात के शुभारंभ को लेकर उत्पन्न मतभेदों का भी जिक्र किया गया।
हालांकि महापंचायत ने इन तर्कों को स्वीकार नहीं किया और कहा कि आस्था, परंपरा और जनभावना के अनुरूप यात्रा तय समय पर ही होनी चाहिए।
हिमालय के महाकुंभ की विशेषता
मां नंदा देवी के सम्मान में हर 12 वर्ष में आयोजित होने वाली नंदा राजजात यात्रा को
की सबसे कठिन धार्मिक यात्राओं में गिना जाता है।
लगभग 280 किलोमीटर लंबी यह पदयात्रा कुमाऊं और गढ़वाल मंडलों को जोड़ती है।
इस यात्रा का नेतृत्व चार सिंह वाली भेड़ (चौसिंघिया खाड़ू) करती है,
जिसके बारे में मान्यता है कि इसका जन्म 12 वर्षों में केवल एक बार होता है। पिछली नंदा राजजात यात्रा 2014 में आयोजित हुई थी।
नौटी से होमकुंड तक आस्था का सफर
यह यात्रा देवी नंदा को उनके मायके से विदा करने का महाउत्सव मानी जाती है।
चमोली जनपद के नौटी गांव से शुरू होकर 19 से 22 दिन में यह यात्रा हिमालय के होमकुंड (रूपकुंड के निकट) में संपन्न होती है।
चौसिंघिया खाड़ू का अंतिम पड़ाव भी होमकुंड ही होता है।
यहीं पूजा-अर्चना के बाद उसे कैलाश पर्वत की ओर विदा किया जाता है।
मान्यता है कि इसके बाद चौसिंघिया मां नंदा देवी के संदेशवाहक के रूप में रहस्यमय तरीके से अदृश्य हो जाता है।
















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