श्रीनगर गढ़वाल की नई पहल और Horn Free City की बढ़ती जरूरत
तेजी से बढ़ते शहरीकरण और सड़कों पर बढ़ती वाहनों की संख्या ने
ध्वनि प्रदूषण को भारत के शहरों की एक गंभीर समस्या बना दिया है।
सड़कों पर बजते अनावश्यक हॉर्न न केवल कानों को नुकसान पहुंचाते हैं,
बल्कि मानसिक तनाव, चिड़चिड़ापन, अनिद्रा और उच्च रक्तचाप जैसी समस्याओं की बड़ी वजह भी बन रहे हैं।
इसी स्थिति को सुधारने के लिए अब देश में Horn Free Policy पर गंभीरता से काम शुरू हो चुका है।
क्या होती है Horn Free Policy
Horn Free Policy का अर्थ है शहर या उसके चिन्हित क्षेत्रों में बिना आवश्यकता हॉर्न बजाने पर रोक।
इस नीति के तहत हॉर्न का उपयोग केवल आपात स्थिति में किया जा सकता है।
इस नीति के प्रमुख प्रावधान
- अस्पताल, स्कूल, न्यायालय और रिहायशी क्षेत्रों को Silent Zone घोषित करना
- प्रेशर हॉर्न और तेज आवाज़ वाले हॉर्न पर पूर्ण प्रतिबंध
- नियमों का उल्लंघन करने पर चालान और कानूनी कार्रवाई
भारत में यह व्यवस्था ध्वनि प्रदूषण (नियंत्रण एवं विनियमन) नियम, 2000 के अंतर्गत लागू होती है, जिसकी निगरानी केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड करते हैं।
Horn Free Policy के प्रमुख फायदे
🔹 ध्वनि प्रदूषण में कमी
अनावश्यक हॉर्न बंद होने से शहरों में शोर का स्तर कम होता है और वातावरण अधिक शांत बनता है।
🔹 स्वास्थ्य पर सकारात्मक असर
लगातार हॉर्न की आवाज़ से होने वाली मानसिक और शारीरिक समस्याओं जैसे सिरदर्द, अनिद्रा और तनाव में कमी आती है।
🔹 मरीजों और छात्रों को राहत
अस्पतालों के आसपास शांति रहने से मरीजों को आराम मिलता है, वहीं स्कूल और कॉलेजों में छात्रों की एकाग्रता बेहतर होती है।
🔹 ट्रैफिक अनुशासन में सुधार
जब चालक हॉर्न पर निर्भर नहीं रहते, तो वे लेन अनुशासन का पालन करते हैं और गलत ओवरटेकिंग से बचते हैं, जिससे सड़क सुरक्षा बढ़ती है।
🔹 शहर की बेहतर छवि
Horn Free City एक सभ्य, अनुशासित और पर्यावरण-संवेदनशील शहर की पहचान बनाता है, जो पर्यटन के लिहाज़ से भी सकारात्मक होता है।
Horn Free Policy की चुनौतियाँ
🔸 लोगों की आदत बदलना
भारत में हॉर्न को अब भी ड्राइविंग का अहम हिस्सा माना जाता है, इसलिए व्यवहार में बदलाव समय लेता है।
🔸 सख्त निगरानी की जरूरत
यदि ट्रैफिक पुलिस और प्रशासन द्वारा चालान, कैमरा निगरानी और फील्ड चेकिंग नहीं की गई, तो नीति प्रभावी नहीं हो पाएगी।
🔸 शुरुआती भ्रम
लोगों को यह स्पष्ट नहीं होता कि हॉर्न कब बजाना वैध है और आपात स्थिति की परिभाषा क्या है, इसलिए साफ दिशा-निर्देश जरूरी हैं।
श्रीनगर गढ़वाल में हॉर्न फ्री जोन की दिशा में पहल
इन्हीं जरूरतों को देखते हुए उत्तराखंड के नगर निगम श्रीनगर गढ़वाल ने शहर
को हॉर्न फ्री और नो ओवरटेकिंग जोन बनाने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है।
नगर निगम सभागार में आयोजित बैठक में प्रशासन, परिवहन विभाग, पुलिस और नगर निगम के प्रतिनिधियों ने इस प्रस्ताव पर विस्तार से चर्चा की।
बैठक में यह बात सामने आई कि श्रीनगर में प्रेशर हॉर्न का अत्यधिक और अनावश्यक प्रयोग आम नागरिकों,
विद्यार्थियों, मरीजों और वरिष्ठ नागरिकों के लिए लगातार परेशानी का कारण बन रहा है।
महापौर आरती भंडारी ने खुद से की शुरुआत
इस पहल को मजबूत बनाने के लिए नगर निगम की महापौर आरती भंडारी ने स्वयं उदाहरण पेश किया।
महापौर ने अपनी सरकारी गाड़ी में हॉर्न का उपयोग बंद कर दिया है।
यह कदम आम जनता को यह संदेश देता है कि बदलाव की शुरुआत नियम बनाने से नहीं, बल्कि उन्हें अपनाने से होती है।
उत्तराखंड में पहल
🔹 देहरादून
- स्कूल, अस्पताल और न्यायालय क्षेत्रों में Silent Zone
- प्रेशर हॉर्न पर कार्रवाई
- ट्रैफिक पुलिस द्वारा चालान
🔹 हरिद्वार
- हर की पौड़ी और मेला क्षेत्र में हॉर्न प्रतिबंध
- कांवड़ यात्रा और कुंभ के दौरान सख्ती
🔹 ऋषिकेश
- आश्रम क्षेत्रों में नो हॉर्न ज़ोन
- पर्यटन क्षेत्रों में जागरूकता अभियान
🔹 नैनीताल
- मॉल रोड और झील क्षेत्र में हॉर्न नियंत्रण
- सीजन में विशेष निगरानी
पूरे भारत के लिए कोई एक समान Horn Free कानून नहीं है,
लेकिन केंद्र सरकार के नियमों के तहत सभी राज्यों को Silent Zone लागू करने का अधिकार और निर्देश है।
यह नियम लागू होता है:
- ध्वनि प्रदूषण (नियंत्रण एवं विनियमन) नियम, 2000
- निगरानी: केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड
भारत के प्रमुख शहर जहां Horn Free पहल
1- मुंबई
- No Honking Day
- ट्रैफिक सिग्नल पर हॉर्न बजाने पर चालान
2- नई दिल्ली
- स्कूल-अस्पताल के आसपास Silent Zone
- हाई-डेसीबल हॉर्न पर प्रतिबंध
3- चंडीगढ़
- सख्त ट्रैफिक नियम
- नो हॉर्न साइनबोर्ड और जुर्माना
4- बेंगलुरु
- Horn Not OK Please अभियान
- जन-सहभागिता आधारित मॉडल
5- कोलकाता
पर्यावरण पुलिस की तैनाती
















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