रिपोर्ट में सामने आए 5 बड़े पैटर्न
उत्तराखंड में ग्लेशियरों के पीछे हटने, ग्लेशियल झीलों और हिमस्खलन का खतरा बढ़ रहा है।
इसके साथ ही चरम मौसम की घटनाएं भी चिंता बढ़ा रही हैं।
सोशल डेवलपमेंट फॉर कम्युनिटीज फाउंडेशन ने देहरादून प्रेस क्लब में अपनी रिपोर्ट “उत्तराखंड ऐट अ क्लाइमेट क्रॉसरोड्स” जारी की।
रिपोर्ट में पिछले चार वर्षों के आपदा संबंधी मीडिया दस्तावेजीकरण का विश्लेषण किया गया है।
रिपोर्ट का विमोचन अनूप नौटियाल और प्रवीण उप्रेती ने संयुक्त रूप से किया।
इसमें जून 2026 तक सामने आए घटनाक्रमों को शामिल किया गया है।
जोखिम की पहचान और कार्रवाई में अंतर
रिपोर्ट में सबसे बड़ा सवाल जोखिम की पहचान और समय पर कार्रवाई के बीच के अंतर को बताया गया है।
राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण ने 2024 में उत्तराखंड की 13 संभावित खतरनाक ग्लेशियल झीलों की पहचान की थी।
इनमें पांच झीलों को सबसे अधिक जोखिम वाली श्रेणी में रखा गया था।
रिपोर्ट के अनुसार, निगरानी और प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली अभी पूरी तरह विकसित नहीं है।
वसुधारा झील का उदाहरण देते हुए रिपोर्ट में बताया गया कि जोखिम आकलन के बावजूद चेतावनी प्रणाली स्थापित होने में देरी की बात सामने आई।
अलकनंदा बेसिन में 219 हैंगिंग ग्लेशियर
रिपोर्ट में 2026 के एक अध्ययन का भी उल्लेख किया गया है। अध्ययन में अलकनंदा बेसिन में 219 हैंगिंग ग्लेशियरों की पहचान की गई।
इनमें करीब 30 प्रतिशत ग्लेशियर बद्रीनाथ और माणा के आसपास ऊपरी अलकनंदा क्षेत्र में स्थित हैं।
रिपोर्ट ने इन ग्लेशियरों से जुड़े संभावित जोखिमों की नियमित निगरानी की जरूरत बताई है।
चारधाम क्षेत्र में तेजी से पीछे हट रहे ग्लेशियर
रिपोर्ट में चारधाम क्षेत्रों के ग्लेशियरों के पीछे हटने की दर को भी रेखांकित किया गया है।
रिपोर्ट के अनुसार, गंगोत्री ग्लेशियर करीब 22.3 मीटर, यमुनोत्री 20 मीटर, बद्रीनाथ 17.3 मीटर और केदारनाथ ग्लेशियर 14.1 मीटर की वार्षिक दर से पीछे हट रहे हैं।
वृहत्तर हिंदू कुश हिमालय क्षेत्र में भी ग्लेशियरों के क्षेत्रफल और बर्फ के भंडार में गिरावट दर्ज की गई है।
रिपोर्ट के मुताबिक, 1990 के बाद एक हजार से अधिक नई ग्लेशियल झीलें सामने आई हैं।
मौसम का बदलता पैटर्न भी चिंता का कारण
रिपोर्ट में चरम मौसम की घटनाओं को भी गंभीर चुनौती बताया गया है। लंबे सूखे के बाद अचानक अत्यधिक बारिश या बर्फबारी जैसी घटनाएं सामने आ रही हैं।
दूसरी ओर, संवेदनशील पर्वतीय क्षेत्रों में सड़क, जलविद्युत, पर्यटन और तीर्थयात्रा से जुड़ा बुनियादी ढांचा बढ़ रहा है।
रिपोर्ट के अनुसार, इन गतिविधियों का विस्तार कई क्षेत्रों में आपदा जोखिम को और बढ़ा सकता है। इसलिए विकास योजनाओं में जलवायु जोखिम को शामिल करना जरूरी है।
रिपोर्ट में पांच प्रमुख सिफारिशें
रिपोर्ट में उत्तराखंड के लिए पांच प्रमुख सुझाव दिए गए हैं।
पहली सिफारिश: उच्च जोखिम वाली ग्लेशियल झीलों के लिए समयबद्ध कार्ययोजना बनाई जाए। प्रत्येक झील के लिए नोडल एजेंसी और पर्याप्त बजट तय किया जाए।
दूसरी सिफारिश: हैंगिंग ग्लेशियर, अस्थिर ढलान, ग्लेशियल झील और हिमस्खलन संभावित क्षेत्रों की व्यवस्थित निगरानी की जाए।
तीसरी सिफारिश: चारधाम यात्रा की योजना में जलवायु जोखिम और क्षेत्र की वहन क्षमता को केंद्रीय आधार बनाया जाए।
चौथी सिफारिश: ग्लेशियर और ग्लेशियल झीलों की निगरानी के लिए दीर्घकालिक क्रायोस्फीयर और जलवायु जोखिम कार्यक्रम शुरू किया जाए।
पांचवीं सिफारिश: हिमालयी समुदायों को आपदा प्रबंधन और जलवायु अनुकूलन के केंद्र में रखा जाए। स्थानीय ज्ञान को वैज्ञानिक निगरानी से जोड़ा जाए।
गांव स्तर पर मजबूत हो आपदा तैयारी
रिपोर्ट में गांव स्तर पर आपदा योजनाएं तैयार करने पर जोर दिया गया है।
इसके साथ प्रशिक्षित स्वयंसेवकों और सामुदायिक निगरानी व्यवस्था की जरूरत बताई गई है।
रिपोर्ट के अनुसार, स्थानीय लोग मौसम, जल स्रोतों, ढलानों और बर्फ में होने वाले बदलावों के शुरुआती पर्यवेक्षक होते हैं।
इसलिए उनके अनुभव को आपदा प्रबंधन व्यवस्था में शामिल किया जाना चाहिए।
आपदाओं को अलग-अलग घटनाओं के रूप में न देखें
अनूप नौटियाल ने कहा कि रिपोर्ट संबंधित सरकारी विभागों और संस्थानों के साथ साझा की जाएगी।
इसका उद्देश्य रिपोर्ट में सामने आए निष्कर्षों पर विचार और आवश्यक कार्रवाई को बढ़ावा देना है।
उन्होंने कहा कि उत्तराखंड में बढ़ती आपदाओं को अलग-अलग घटनाओं के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
ये राज्य के तेजी से बदलते हिमालयी पर्यावरण के संकेत हैं।
रिपोर्ट में बेहतर तैयारी, जवाबदेही और दीर्घकालिक योजना को समय की जरूरत बताया गया है।
















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