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सात मोड़ फोरलेन: सड़क बने या बचे जंगल, सरकार के सामने दोहरी चुनौती

देहरादून-ऋषिकेश के बीच प्रस्तावित सात मोड़ फोरलेन परियोजना अब सिर्फ सड़क चौड़ीकरण का मामला नहीं रह गई है।

यह परियोजना विकास, वन्यजीव संरक्षण और स्थानीय जनभावनाओं के बीच संतुलन की बड़ी चुनौती बन गई है।

एक तरफ बढ़ता यातायात, जौलीग्रांट एयरपोर्ट और चारधाम यात्रा का दबाव है। दूसरी तरफ जंगल, हाथियों का कॉरिडोर और हजारों पेड़ों का सवाल है।

विरोध बढ़ने के बाद सरकार ने पेड़ कटान पर रोक लगाकर सभी पक्षों से बातचीत का रास्ता चुना है। हालांकि, पहली जनसंवाद बैठक में सहमति नहीं बन सकी।

करीब 20 किलोमीटर लंबी है परियोजना

NHAI की परियोजना प्रस्तुति के अनुसार भानियावाला-जौलीग्रांट-ऋषिकेश NH-7 परियोजना की लंबाई करीब 19.780 किलोमीटर है।

इस मार्ग का लगभग आठ किलोमीटर हिस्सा वन क्षेत्र से होकर गुजरता है। बाकी हिस्सा आबादी वाले क्षेत्रों में आता है।

परियोजना का उद्देश्य मौजूदा सड़क को अपग्रेड कर यातायात को सुरक्षित और सुगम बनाना है।

देहरादून, जौलीग्रांट एयरपोर्ट और ऋषिकेश के बीच लगातार बढ़ते यातायात को भी परियोजना की बड़ी वजह बताया गया है।

पर्यटन और चारधाम यात्रा के दौरान इस मार्ग पर यातायात का दबाव और बढ़ जाता है।

सात मोड़ पर क्यों अटका है फोरलेन प्रोजेक्ट?

सात मोड़ क्षेत्र में मौजूदा सड़क दो लेन की है। इस हिस्से में सात तीखे मोड़ भी मौजूद हैं।

NHAI के अनुसार वर्ष 2020 में इस क्षेत्र का यातायात करीब 17,054 PCU था। वर्ष 2026 में यह बढ़कर 27,872 PCU अनुमानित है।

NHAI का तर्क है कि बढ़ते यातायात के बीच मौजूदा सड़क और तीखे मोड़ दुर्घटनाओं का खतरा बढ़ाते हैं।

इसी कारण नए डिजाइन में सातों मोड़ों को हटाकर सड़क का नया अलाइनमेंट तैयार करने की योजना है।

NHAI के मुताबिक नया अलाइनमेंट काफी हद तक मौजूदा सड़क के ऊपर या उसके समानांतर रखने का प्रयास किया गया है।

असली चुनौती जंगल और हाथियों का रास्ता

सात मोड़ क्षेत्र की सबसे बड़ी चुनौती इसका वन क्षेत्र है। सड़क पहले ही जंगल को दो हिस्सों में बांटती है।

इससे वन्यजीवों के प्राकृतिक आवागमन पर असर पड़ने की बात सामने आती रही है।

क्षेत्र में मानव-हाथी संघर्ष और सड़क दुर्घटनाओं की घटनाएं भी इसी चुनौती को गंभीर बनाती हैं।

कई मौकों पर हाथियों की आवाजाही को देखते हुए वाहनों को पेट्रोलिंग के जरिए जंगल से पार कराया जाता है।

स्थिति बिगड़ने पर रात में वाहनों की आवाजाही रोकने जैसी परिस्थितियां भी सामने आती हैं।

मौजूदा सड़क पर 29 वन्यजीव दुर्घटनाएं

NHAI की प्रस्तुति में वन विभाग के रिकॉर्ड का हवाला देते हुए वन्यजीव दुर्घटनाओं का आंकड़ा भी दिया गया है।

इसके मुताबिक पिछले पांच से दस वर्षों में मौजूदा सात मोड़ मार्ग पर 29 वन्यजीव सड़क दुर्घटनाओं में मौतें दर्ज हुई हैं।

प्रस्तुति में WII की Elephant Corridors of India-2023 रिपोर्ट का भी उल्लेख किया गया है।

इसके अनुसार तीनपानी और कंसरा-बड़कोट यानी लाल तप्पड़ एलिफेंट कॉरिडोर परियोजना क्षेत्र से जुड़े हैं।

NHAI का कहना है कि हाईवे पार करने के लिए समर्पित एलिफेंट अंडरपास नहीं होने से जोखिम बढ़ता है।

NHAI का दावा- फोरलेन के साथ हाथियों की सुरक्षा

NHAI परियोजना को केवल सड़क चौड़ीकरण के रूप में नहीं देख रहा है।

परियोजना में वन्यजीवों की आवाजाही को सुरक्षित बनाने के लिए कई उपाय प्रस्तावित किए गए हैं।

NHAI के मुताबिक WII की सिफारिशों और WWF-India के कैमरा ट्रैप अध्ययन के आधार पर पांच एलिफेंट अंडरपास प्रस्तावित हैं।

इनमें चार अंडरपास करीब 3.06 किलोमीटर लंबी एलिवेटेड संरचना के हिस्से में प्रस्तावित हैं।

इसके अलावा ग्रीन गाइड हेज, साउंड बैरियर और एंटी-ग्लेयर स्क्रीन लगाने का भी प्रस्ताव है।

वन्यजीव चेतावनी संकेत, स्पीड कैलमिंग और नो-हॉर्न जोन जैसे उपाय भी योजना में शामिल हैं।

पर्यावरणविदों का सवाल- क्या अंडरपास ही पर्याप्त समाधान

पर्यावरण कार्यकर्ताओं की चिंता सड़क चौड़ीकरण से होने वाले पर्यावरणीय नुकसान को लेकर है।

उनका सवाल है कि हाथियों के लिए अंडरपास बनाने के साथ यदि बड़े पैमाने पर पेड़ काटे जाएंगे, तो इसका संतुलन कैसे बनेगा।

सिटीजन फॉर ग्रीन देहरादून के संस्थापक हिमांशु अरोड़ा ने सरकार की जनसंवाद पहल का स्वागत किया है।

हालांकि, उनका कहना है कि ऐसी परियोजनाओं पर स्थानीय लोगों और विशेषज्ञों के साथ बातचीत शुरुआत में ही होनी चाहिए।

उनके मुताबिक केवल अंडरपास बनाना पर्याप्त नहीं है। निर्माण के दौरान हाथियों के व्यवहार और उनके पुराने मूवमेंट रूट पर भी अध्ययन जरूरी है।

हजारों पेड़ों की कटाई बना सबसे बड़ा विवाद

सात मोड़ परियोजना में पेड़ों की संख्या भी विवाद का प्रमुख कारण है।

NHAI की प्रस्तुति में उत्तराखंड के वन क्षेत्र में कुल 4,442 पेड़ों के प्रभावित होने की बात कही गई है।

वहीं सार्वजनिक चर्चा में 4,369 पेड़ों का आंकड़ा भी सामने आया है।

ऐसे में यह स्पष्ट करना जरूरी है कि अंतिम रूप से कितने पेड़ काटे जाएंगे।

कितने पेड़ों का ट्रांसप्लांटेशन होगा और कितने पेड़ अन्य श्रेणियों में आएंगे, इसकी जानकारी भी सार्वजनिक होनी चाहिए।

754 पेड़ों के ट्रांसप्लांटेशन का दावा

NHAI का कहना है कि वन क्षेत्र में सामान्य 60 मीटर राइट ऑफ वे को घटाकर 23 मीटर किया गया है।

इसका उद्देश्य परियोजना के लिए होने वाली पेड़ों की कटाई को कम करना है।

FRI के वैज्ञानिक आकलन के आधार पर 754 पेड़ों को ट्रांसप्लांटेशन के लिए उपयुक्त चिन्हित किए जाने की बात भी सामने आई है।

हालांकि, पर्यावरण विशेषज्ञों के लिए केवल ट्रांसप्लांटेशन की संख्या महत्वपूर्ण नहीं है।

पेड़ों के जीवित रहने की दर, उनकी निगरानी और ट्रांसप्लांटेशन के बाद की स्थिति भी उतनी ही अहम है।

पहली जनसंवाद बैठक क्यों रही बेनतीजा?

सरकार ने विवाद बढ़ने के बाद सभी संबंधित पक्षों से बातचीत का फैसला किया।

NHAI, PWD और स्थानीय प्रशासन ने लोगों के साथ जनसंवाद की प्रक्रिया शुरू की।

लेकिन पहली पब्लिक कंसल्टेंसी में किसी ठोस समाधान पर सहमति नहीं बन सकी।

यही स्थिति अब सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती खड़ी करती है।

सवाल यह है कि विकास परियोजना को आगे बढ़ाते हुए पर्यावरण और स्थानीय लोगों की चिंताओं को कैसे शामिल किया जाए।

सरकार के सामने तीन बड़ी चुनौतियां

सात मोड़ परियोजना को लेकर सरकार के सामने तीन प्रमुख चुनौतियां दिखाई देती हैं।

पहली चुनौती बढ़ते यातायात के दबाव और सड़क सुरक्षा की जरूरत को पूरा करना है।

दूसरी चुनौती हाथियों के प्राकृतिक आवागमन और एलिफेंट कॉरिडोर को सुरक्षित रखना है।

तीसरी चुनौती स्थानीय लोगों और पर्यावरण कार्यकर्ताओं का भरोसा बनाए रखना है।

इन तीनों मुद्दों में संतुलन बनाना आसान नहीं होगा।

चुनाव से ज्यादा बड़ा है सात मोड़ का सवाल

यह मामला विधानसभा चुनाव से पहले राजनीतिक रूप से भी महत्वपूर्ण हो सकता है।

हालांकि, सात मोड़ विवाद को केवल राजनीतिक मुद्दे के तौर पर देखना सही नहीं होगा।

उत्तराखंड में सड़क, पर्यटन और चारधाम से जुड़ी कई परियोजनाएं पर्यावरणीय रूप से संवेदनशील क्षेत्रों से गुजरती हैं।

ऐसे में सात मोड़ परियोजना भविष्य की दूसरी बड़ी परियोजनाओं के लिए भी एक उदाहरण बन सकती है।

यदि सरकार संवाद से समाधान निकालती है, तो विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन का मॉडल सामने आ सकता है।

आखिर रास्ता क्या हो सकता है?

सात मोड़ का विवाद किसी एक पक्ष के पूरी तरह सही या गलत होने का मामला नहीं है।

बढ़ते यातायात और सड़क सुरक्षा की जरूरत को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

इसी तरह जंगल और हाथियों के प्राकृतिक आवागमन की कीमत पर विकास को भी अंतिम समाधान नहीं माना जा सकता।

इसलिए आगे बढ़ने से पहले स्वतंत्र पर्यावरणीय आकलन, हाथियों के मूवमेंट का वैज्ञानिक अध्ययन और पेड़ों की स्पष्ट सूची जरूरी है।

निर्माण के दौरान वन्यजीवों की निगरानी और ट्रैफिक प्रबंधन की ठोस व्यवस्था भी जरूरी होगी।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि सरकार की अगली जनसंवाद प्रक्रिया वास्तव में खुली और पारदर्शी हो।

सात मोड़ का असली समाधान शायद सड़क को रोकना या जंगल को नजरअंदाज करना नहीं है। समाधान ऐसा रास्ता तलाशना है, जिसमें विकास भी हो और हाथियों का रास्ता भी सुरक्षित रहे।

https://regionalreporter.in/uttarakhand-climate-disaster-report-glaciers-glof-avalanche/
https://youtu.be/y9QpImppl2I?si=GGmZj6WYiG0ay1Bl
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