मां नंदा की बड़ी जात यात्रा शुरू, 20 सितंबर को होमकुंड में होगी कैलाश विदाई
हिमालय महाकुंभ के रूप में प्रसिद्ध मां नंदा की बड़ी जात यात्रा 5 सितंबर को सिद्धपीठ कुरुड़ से शुरू हुई।
मां नंदा की तीनों डोलियां कैलाश के लिए रवाना हुईं। डोली के प्रस्थान के साथ कुरुड़ क्षेत्र ‘जय मां नंदा’ के जयकारों से गूंज उठा। बड़ी संख्या में श्रद्धालु भी यात्रा में शामिल हुए।
पांच दिन की पूजा के बाद डोली को दी विदाई
सिद्धपीठ कुरुड़ में मां नंदा राजराजेश्वरी की पांच दिवसीय पूजा-अर्चना और धार्मिक अनुष्ठान संपन्न हुए।
सके बाद डोलियों को कैलाश के लिए विदा किया गया। विदाई के दौरान श्रद्धालु भावुक हो गए।
भक्तों ने डोली के दर्शन कर आशीर्वाद लिया और यात्रा की सफलता की कामना की।
296 किलोमीटर की पैदल यात्रा
मां नंदा की बड़ी जात यात्रा करीब 296 किलोमीटर लंबी है। यात्रा पांच निर्जन और 21 आबादी वाले पड़ावों से होकर गुजरेगी।
इस बार यात्रा की अगुआई चौसिंग्या खाडू कर रहा है। यह चार सींग वाला मेढ़ा मां नंदा की कैलाश यात्रा का मार्गदर्शक माना जाता है।
20 सितंबर को होमकुंड में होगी कैलाश विदाई
यात्रा के दौरान चौसिंग्या खाडू को विशेष धार्मिक महत्व दिया जाता है।
निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार 20 सितंबर को होमकुंड में मां नंदा की महापूजा होगी। इसके बाद चौसिंग्या खाडू को कैलाश के लिए विदा किया जाएगा।
30 सितंबर को कुरुड़ लौटेगी उत्सव डोली
होमकुंड में धार्मिक अनुष्ठान के बाद यात्रा वापसी के लिए आगे बढ़ेगी।
निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार 30 सितंबर को उत्सव डोली के कुरुड़ लौटने के साथ बड़ी जात यात्रा का समापन प्रस्तावित है।
ऐसा रहेगा यात्रा का रूट
- 5 सितंबर: सिद्धपीठ कुरुड़ से यात्रा शुरू।
- 12 सितंबर: रामणी में देव डोलियों और छंतोलियों का मिलन।
- इसके बाद: आला, सितेल और कनोंल होते हुए यात्रा आगे बढ़ेगी।
- 15 सितंबर: वाण स्थित लाटू मंदिर में डोली का प्रवास।
- 18 सितंबर: वेदनी बुग्याल में सप्तमी की पूजा-अर्चना।
- 19 सितंबर: बगुवावासा, पातरनचैणियां, कैलवा विनायक, रूपकुंड और ज्यूंरागली होते हुए शिलासमुद्र पहुंचने का कार्यक्रम।
- 20 सितंबर: होमकुंड में मां नंदा की महापूजा और चौसिंग्या खाडू की कैलाश विदाई।
- 30 सितंबर: कुरुड़ लौटने के साथ यात्रा का समापन प्रस्तावित।
12 साल बाद आयोजित हो रही बड़ी जात
बड़ी जात यात्रा को लेकर चमोली सहित प्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों से श्रद्धालु पहुंच रहे हैं।
12 वर्ष बाद आयोजित हो रही इस यात्रा को लेकर भक्तों में विशेष उत्साह है।
जगह-जगह मां नंदा के जयकारों और पारंपरिक ढोल-नगाड़ों से माहौल भक्तिमय बना हुआ है।
इस बार दो यात्राएं क्यों हो रही हैं?
इस बार मां नंदा की दो यात्राओं को लेकर अलग-अलग आयोजन सामने आए हैं।
नौटी राजजात समिति और जिला प्रशासन ने नंदा देवी राजजात यात्रा को 2027 तक स्थगित किया है।
इसके पीछे मलमास, मौसम और ऊंचाई वाले क्षेत्रों में सुविधाओं की कमी को प्रमुख वजह बताया गया है।
वहीं, कुरुड़ मंदिर समिति ने परंपरा के अनुसार इसी वर्ष बड़ी जात आयोजित करने का निर्णय लिया।
कुरुड़ पक्ष का कहना है कि यात्रा की पुरानी धार्मिक परंपराओं में कुरुड़ का महत्वपूर्ण स्थान है।
मां नंदा को कैलाश विदा करने की परंपरा
मां नंदा की यात्रा उत्तराखंड की महत्वपूर्ण धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं में शामिल है।
लोक मान्यताओं के अनुसार मां नंदा को पहाड़ की बेटी माना जाता है।
इसलिए उन्हें मायके से कैलाश की ओर विदा करने का यह अवसर श्रद्धालुओं के लिए विशेष भावनात्मक महत्व रखता है।
बड़ी जात यात्रा के दौरान श्रद्धालु मां नंदा की डोली के साथ कठिन हिमालयी रास्तों पर चलते हैं।
विभिन्न पड़ावों पर पूजा-अर्चना और धार्मिक अनुष्ठान किए जाते हैं। इस वर्ष भी यात्रा के दौरान यही परंपराएं निभाई जा रही हैं।















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