चाहे हम नि ल्यै सकूँ चाहे तुम नि लै सकौ,
मगर क्वे न क्वे तो ल्यालो उदिन यो दुनी में…..”गिर्दा”
देहरादून, पौड़ी, चमोली, पिथौरागढ़, उत्तरकाशी, श्रीनगर समेत अन्य शहरों में शुक्रवार 22 अगस्त गिरीश चंद्र तिवारी “गिर्दा” पुण्य तिथि पर हर छोटे-बड़े नगरों तथा कस्बों में गिर्द के गीत गाए गए। विवि में नन्हे-मुन्नों ने, कई सामाजिक संगठनों ने उनके गीतों की प्रतिध्वनि को रेखांकित किया।
श्रीनगर के अजीम प्रेम जी फाउंडेशन में हेमवती नंदन बहुगुणा विश्व विद्यालय के अध्ययनरत विभिन्न विद्यार्थियों ने जन कवि गिरीश चंद्र तिवारी “गिर्दा” के संपूर्ण व्यक्तित्व को जाना
इस कार्यक्रम में अनिल स्वामी, डॉ.अरुण कुकसाल, पूर्व विभागाध्यक्ष प्रौढ़ सतत शिक्षा क्रेन्द्रिय विश्वविद्याल डॉ. एस.एस रावत, वरिष्ट बीमा कर्ता सीताराम बहुगुणा, रीजनल रिपोर्ट की संपादक गंगा असनोड़ा, योगेंद्र कांडपाल इत्यादि व्यक्ति विशेष आमंत्रित रहे।

अपने संबोधन में डॉ.अरुण कुक्शाल व अनील स्वामी ने गिर्दा का जीवन परिचय देते हुए बताया कि उनका जन्म 10 सितम्बर 1945 दर्ज है लेकिन उनके परिवार के लोग उनका जन्म 1943 में बताते हैं। गिर्दा का जन्म अल्मोड़ा जिले के हवालबाग विकासखण्ड के गाँव ज्योलि में हुआ था।
शिक्षा व समाज
पढ़ाई वे में कुछ खास नहीं थे ज्योली गांव में उनकी गिनती आवारा और नालायक लड़कों में होती थी। तभी तो, अपने जीवन के आखरी पड़ाव तक ‘गिर्दा अपने को ज्योली का नालायक कहते रहे।
गांव-समाज में व्याप्त सामाजिक भेदभाव को ‘परे हट’ कहते हुए हुड़का, ढोल और हारमोनियम वादक उनके सबसे प्रिय संगी-साथी थे। गांव-समाज के सयाने उसे लताड़े हुए कहते कि – ‘सब भ्रष्ट करी हालो तैल’ (तूने, सब भ्रष्ट कर दिया है)
जन आंदोलनों में भागीदारी
फिर उनके जीवन में एक ऐसा मोड़ आया जो उन्हें सामाजिक सरोकारों में प्रत्यक्ष भागेदारी की ओर ले गया। और गिर्दा ने अपने को सरकारी नौकर से ज्यादा आदमी होने को प्रमुखता दी।
गिर्दा’ के जन-आन्दोलनों में सशक्त भागीदारी की शुरुआत 27 नवम्बर, 1977 को वनों की नीलामी के खिलाफ नैनीताल में हुये प्रर्दशन से हुई।
इस जन- प्रदर्शन में ‘गिर्दा ने सन् 1926 मे गौरी दत्त पाण्डे ‘गौर्दा’ की लिखी ‘वृक्षन को विलाप’ कविता को नये तेवर और तीखे शब्दों के साथ रचकर गाया। प्रदर्शन में हुडका लिए गिर्दा –
आज हिमाल तुमन कै धत्यू छौं, जागो- जागो हो मेरा लाल,
नी करी दी हालो हमरी निलामी, नी करी दी हालो हमरो हलाल’
गीत गया।
गिर्दा का रचना संसार
गिर्दा’ ने जीवन-भर अपना रचना संसार रचा. फैज, गालिब, इकबाल, फिराक, साहिर, नीरज, नागार्जुन, गौर्दा, गुमानी, केशव अनुरागी, शेरदा अनपढ़, घनश्याम सैलानी, चारुचन्द्र पाण्डे, गुणानंद ‘पथिक’ के लेखन और कला से उनकी दोस्ती जवान हो रही उम्र में ही हो गई थी।
उन्होने ‘नगाड़े खामोश हैं’ और ‘धनुष यज्ञ’ नाटक लिखे। ‘अंधा युग’, ‘अंधेर नगरी, चौपट राजा’ और ‘थैंकू मिस्टर ग्लाड’ जैसे नाटकों का सफल निर्देशन किया।
कई नुक्कड़ नाटकों के साथ भारत सरकार के गीत और नाटक प्रभाग के लिए ‘मोहिल माटी’ ‘राम’, ‘कृष्ण’ तथा होली रचनायें लिखी और उनका निर्देशन किया।
‘गिर्दा’ ने हिन्दी और कुमाउंनी दोनों में बराबर लिखा अपनी कुमाउंनी कविताओं का स्वयं अनुवाद भी किया।
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