वरिष्ठ साहित्यप्रेमी डॉ. अतुल शर्मा बोले—“किताबें कभी खत्म नहीं होंगी, बस पाठकों की जरूरत है”
उत्तराखंड की राजधानी में आयोजित पुस्तक मेले में एक बार फिर किताबों की दुनिया ने पाठकों को अपनी ओर खींचा।
मेले में पहुंचे वरिष्ठ साहित्यप्रेमी डॉ. अतुल शर्मा के लिए यह अनुभव किसी भावनात्मक यात्रा से कम नहीं रहा।
उन्होंने प्रसिद्ध लेखक विनोद कुमार शुक्ल का चर्चित उपन्यास “नौकर की कमीज़” और उनकी प्रतिनिधि कविताएं खरीदीं, साथ ही ममता कालिया का कहानी संग्रह भी अपने साथ लिया।
किताबों के बीच मिला अपनापन और सुकून
डॉ. शर्मा ने बताया कि जैसे ही वे पुस्तक मेले में पहुंचे, उन्हें ऐसा महसूस हुआ मानो वे अपने “असली घर” में लौट आए हों।
किताबों की खुशबू, स्टॉल्स की हलचल और पाठकों की मौजूदगी ने उनके भीतर पुरानी यादों को ताजा कर दिया।
उन्होंने कहा कि देहरादून में मेला लगा है, यह सुनते ही मन में जाने की इच्छा जागी और वे अपने परिवार के साथ वहां पहुंचे।
80–90 के दशक की यादें हुईं ताजा
मेले में घूमते हुए डॉ. शर्मा को अपने जीवन का वह दौर याद आया, जब उन्होंने लाइब्रेरी बुक सप्लाई का काम शुरू किया था।
उस समय वे राजकमल प्रकाशन, वाणी प्रकाशन और राधाकृष्ण प्रकाशन जैसे प्रतिष्ठित प्रकाशनों से किताबें लेकर
विश्वविद्यालयों और कॉलेजों की लाइब्रेरी में सप्लाई करते थे।
उन्होंने बताया कि घर में हर समय किताबों का माहौल रहता था-बिलिंग, पैकिंग और सप्लाई की प्रक्रिया चलती रहती थी।
हालांकि पेमेंट में दिक्कतें आती थीं, लेकिन काम के प्रति लगाव और संतोष हमेशा बना रहा।

दरियागंज: कभी प्रकाशन जगत का केंद्र
डॉ. शर्मा ने दिल्ली के दरियागंज इलाके को याद करते हुए बताया कि अंसारी रोड
और आसिफ अली रोड उस समय प्रकाशन जगत के प्रमुख केंद्र हुआ करते थे।
रेल के जरिए किताबों की सप्लाई होती थी-बिल्टी, वीपीपी और पार्सल के माध्यम से किताबें मंगाई जाती थीं।
इस दौरान उन्होंने अपनी निजी लाइब्रेरी भी तैयार की, जिसमें कई दुर्लभ और पसंदीदा किताबें शामिल थीं।
समय बदला, लेकिन किताबों का आकर्षण कायम
उन्होंने कहा कि आज भले ही नई पीढ़ी सामने आ चुकी है और समय काफी बदल गया है,
लेकिन किताबों का आकर्षण आज भी वैसा ही बना हुआ है।
हालांकि उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि प्रकाशन एक व्यवसाय है और वही किताबें ज्यादा छपती हैं,
जिनकी मांग अधिक होती है। पुरस्कार विजेता और क्लासिक साहित्य की किताबों की लोकप्रियता आज भी बरकरार है।
ई-बुक्स के दौर में भी कायम है पुस्तक मेलों की अहमियत
डॉ. शर्मा के अनुसार डिजिटल युग में ई-बुक्स का चलन बढ़ा है, लेकिन इसके बावजूद पुस्तक मेलों की महत्ता कम नहीं हुई है।
उन्होंने कहा कि कई लोग किताबों की कीमत को लेकर सवाल उठाते हैं,
लेकिन सच्चे पाठक हर परिस्थिति में किताबें खरीदते हैं। उनका मानना है कि “किताबें कभी समाप्त नहीं होंगी।”
खुद 40 किताबें लिख चुके हैं डॉ. शर्मा
दिलचस्प बात यह है कि डॉ. शर्मा स्वयं भी करीब 40 किताबें लिख चुके हैं।
हालांकि उनके पास अब उनकी अपनी लिखी किताबों की प्रतियां नहीं बची हैं, लेकिन उन्हें इस बात का संतोष है कि उनकी रचनाएं पाठकों तक पहुंचीं।
युवाओं की भीड़ और एक सवाल
मेले से लौटते समय उन्होंने पास में चल रहे सांस्कृतिक कार्यक्रम में युवाओं की भारी भीड़ देखी। इसी दौरान उनके मन में एक सवाल उठा-क्या कभी इतनी ही भीड़ किताबों के लिए भी उमड़ेगी?
इसी उम्मीद और एक खूबसूरत कल्पना के साथ वे मेले से लौटे।
















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