जलवायु परिवर्तन के संकेत और गहराए, पर्यावरणविदों ने जताई चिंता
मदमहेश्वर घाटी में इस वर्ष प्रकृति का मिजाज बदला-बदला नजर आ रहा है।
आमतौर पर मार्च–अप्रैल में घाटी की पहाड़ियों और वनों को लालिमा से भर देने वाला
बुरांस (रोडोडेंड्रोन) इस बार जनवरी के अंत से ही खिलने लगा है।
यह दृश्य जहां प्रकृति प्रेमियों के लिए मनोहारी है, वहीं स्थानीय लोगों और पर्यावरण विशेषज्ञों के लिए गंभीर चिंता का विषय बन गया है।
निर्धारित समय से पहले पुष्पन
स्थानीय ग्रामीणों, वनकर्मियों और प्रकृति प्रेमियों के अनुसार बुरांस का फूल इस बार
अपने तय मौसम से करीब डेढ़ से दो महीने पहले दिखाई दे रहा है।
सामान्य वर्षों में चैत्र मास के आसपास अपने पूर्ण यौवन पर रहने वाला बुरांस अब शीत ऋतु समाप्त होने से पहले ही खिलने लगा है।
कम बर्फबारी और बढ़ता तापमान बना कारण
स्थानीय जानकारों का कहना है कि इस सर्दी में मदमहेश्वर घाटी
और ऊंचाई वाले क्षेत्रों में अपेक्षित बर्फबारी नहीं हुई।
इसके साथ ही दिन और रात के तापमान में भी सामान्य से अधिक वृद्धि दर्ज की गई।
लंबे समय तक शुष्क मौसम बने रहने और ठंड की अवधि कम होने से बुरांस जैसे शीतोष्ण प्रजाति के वृक्षों के जैविक चक्र में बदलाव देखने को मिल रहा है।
अन्य पर्वतीय वनस्पतियों पर भी असर
वनस्पति वैज्ञानिकों के अनुसार बुरांस का पुष्पन तापमान, आर्द्रता और वर्षा के संतुलन पर निर्भर करता है।
जब सर्दियों में पर्याप्त ठंड नहीं पड़ती और बसंत जैसी परिस्थितियां जल्दी बन जाती हैं, तो वृक्ष समय से पहले फूलने लगते हैं।
यह परिवर्तन केवल बुरांस तक सीमित नहीं है, बल्कि फ्यूली, आड़ू, खुबानी और अन्य पर्वतीय वनस्पतियों में भी देखने को मिल रहा है।
परागण प्रक्रिया पर खतरा
पर्यावरणविदों के मुताबिक समय से पहले फूल खिलने से परागण की प्राकृतिक प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है।
उस समय परागण करने वाले कीट और पक्षी सक्रिय अवस्था में नहीं होते,
जिससे बीज उत्पादन और वनस्पतियों के पुनरुत्पादन पर नकारात्मक असर पड़ सकता है।
इसका प्रभाव आगे चलकर पूरे पारिस्थितिकी तंत्र पर पड़ने की आशंका है।
संस्कृति और आजीविका से जुड़ा है बुरांस
स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि बुरांस केवल एक फूल नहीं, बल्कि पहाड़ी संस्कृति, आस्था और
आजीविका का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
इसके फूलों से पारंपरिक पेय, औषधियां और स्थानीय उत्पाद तैयार किए जाते हैं।
मदमहेश्वर घाटी के प्रगतिशील काश्तकार बलवीर राणा बताते हैं कि एक दशक पहले तक
बुरांस चैत्र मास के आरंभ में अपने पूर्ण यौवन पर रहता था,
लेकिन बीते वर्षों में यह लगातार समय से पहले खिलने लगा है, जो भविष्य के लिए शुभ संकेत नहीं है।
विशेषज्ञों की चेतावनी
प्रोफेसर कविता भट्ट शैलपुत्री ने जलवायु परिवर्तन के प्रभावों पर गंभीरता से ध्यान देने की आवश्यकता
बताते हुए कहा कि दीर्घकालिक मौसम अध्ययन, वनों का संरक्षण और
स्थानीय स्तर पर जन-जागरूकता बढ़ाना अत्यंत जरूरी है,
ताकि मदमहेश्वर घाटी जैसी संवेदनशील हिमालयी पारिस्थितिकी को सुरक्षित रखा जा सके।















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