पहाड़ों में होली केवल रंगों का उत्सव नहीं, बल्कि गहरी धार्मिक मान्यताओं और प्राचीन परंपराओं का संगम है।
इसी कड़ी में शुक्रवार, 27 फरवरी को श्रीनगर के एजेंसी मोहल्ला में शुक्रवार को पारंपरिक ‘चीर’ स्थापित की गई।
खास बात यह है कि स्थानीय मोहल्ला वासी पिछले 27 वर्षों से लगातार इस परंपरा को निभाते आ रहे हैं।
इस वर्ष भी बुघानी रोड से पवित्र चीर लाकर उसे विधि-विधान के साथ स्थापित किया गया।
क्या है चीर बंधन की अनोखी परंपरा
उत्तराखंड की संस्कृति में होलिकाष्टमी के दिन पयां या मेलू के पेड़ की टहनी काटकर
‘चीर’ स्थापित करने की परंपरा है।
इस चीर पर विभिन्न रंगों के कपड़ों की कतरनों को झंडे के रूप में बांधा जाता है।
प्रसिद्ध ज्योतिषाचार्य जगदंबा प्रसाद चमोला के अनुसार, यह परंपरा सदियों पुरानी है।
इसके पीछे भक्त प्रह्लाद और होलिका की पौराणिक कथा जुड़ी है।
मान्यता है कि हिरण्यकश्यप की बहन होलिका के पास एक ऐसा दिव्य वस्त्र था, जिसे ओढ़ने पर अग्नि उसे जला नहीं सकती थी।
जब वह प्रह्लाद को लेकर चिता पर बैठी, तो वह वस्त्र प्रह्लाद की रक्षा हेतु उनके ऊपर चला गया
और होलिका भस्म हो गई।
चीर पर बांधी जाने वाली रंग-बिरंगी कतरनें उसी होलिका के वस्त्रों का प्रतीक मानी जाती हैं।
जिस प्रकार होलिका को चिता पर बैठने से पूर्व सजाया गया था, ठीक उसी प्रकार इस चीर को भी सजाया जाता है।

स्थापना से दहन तक का सफर
गढ़वाल के कई हिस्सों में चीर को एक निश्चित स्थान पर स्थापित कर होलिका दहन के दिन तक
उसकी पूजा-अर्चना की जाती है।
वहीं, कई क्षेत्रों में ‘होल्यार’ (होली गाने वाले) इस चीर को अपने साथ लेकर घर-घर घूमते हैं।
होलिका दहन के समय इन कपड़ों की कतरनों को प्राप्त करना शुभ माना जाता है, जिसे लोग प्रसाद स्वरूप अपने घर ले जाते हैं।
दहन के पश्चात इसकी पवित्र राख से टीका लगाकर होली खेलने की शुरुआत होती है।
सामाजिक सहभागिता
श्रीनगर में आयोजित इस कार्यक्रम के दौरान स्थानीय लोगों में भारी उत्साह देखा गया।
इस विशेष अवसर पर पूर्व सभासद अनूप बहुगुणा, विजय रावल, पंकज रावत, कालीचरण रावत, जगमोहन बिष्ट, गुलाब बिष्ट, मुकेश उनियाल, नीरज बहुगुणा, विमल जोशी, अमित रावत, प्रमोद पंवार रमेश रावत, अमर रावत, दीपक बिष्ट और लखन पुंडीर सहित कई गणमान्य व्यक्ति और स्थानीय निवासी मौजूद रहे।
ढोल-दमाऊ की थाप और पारंपरिक गीतों के बीच चीर स्थापना की यह रस्म संपन्न हुई।
















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