गजेन्द्र दानू
श्रीनगर गढ़वाल से धारी देवी मंदिर की ओर बमुश्किल पांच छः किलोमीटर आगे राष्ट्रीय राजमार्ग पर आगे चलकर श्रीनगर जलविद्युत परियोजना की झील के तट से सटे हुए और फरासू से चंद मीटर पहले हनुमान मंदिर के पास ही एक नया भूस्खलन ज़ोन राष्ट्रीय राजमार्ग के इंजीनियरों और जलविद्युत परियोजना की अनदेखी के चलते पैदा हो गया है।
सुपाड़ा -फरासू झील के दक्षिणी ढाल से होकर गुजर रही राष्ट्रीय राजमार्ग की मुख्य सड़क, जो कि परियोजना की झील के चलते आये दिन भूस्खलन से ग्रसित होकर बाधित रहती है।
उसके ठीक ऊपर करीब 200 मीटर ऊपर, से फरासू से स्वीत की ओर इसी परियोजना के शुरुआती दिनों में ‘कोटेश्वर डैम ‘ के नाम से जाने जाते वक्त से सिंचाई विभाग के तत्कालीन इंजीनियरों की सलाह पर फरासू से ही मुख्य सड़क को जोड़ते हुए इस भूस्खलन क्षेत्र के ऊपर से गुजर कर श्रीकोट की तरफ स्वीत से कुछ पहले तक काटी जा चुकी है और यह मार्ग राष्ट्रीय राजमार्ग का विकल्प ही थी उसे पूरा कर नईं बना दिया जाए।
फरासु हनुमान मंदिर के पास इस सड़क का अगर चौड़ीकरण किया जायेगा तो यह सड़क निकट भविष्य में अपने ऊपर की टूटी -फूटी अवस्था वाली फिलाइट्, लाइमस्टोन, स्लेट और शेयर्ड क्वार्जाइट्स व मेटाबेसिक ऑरिजन की कैल्शियम, मैग्नीशियम और आयरन युक्त चट्टानों का मिक्सरुप है।

इन चट्टानों की यह दशा प्रीकैमब्रियन काल में तीव्र टैक्टोनिक तनाव के चलते बनी हुई हैं। और टैक्टोनिक तनावपूर्ण गतिविधियों के बाद मल्टीफोल्डेड, भूगर्भीय चट्टानी संरचना की दृष्टि से तीव्र ढाल वाली खड़ी व बहुत कम झुकाव रखने वाली क्षत-विक्षत अत्यंत घुमावदार अवस्था में अवस्थित हैं।
इसी टैक्टोनिक बल के कारण इस क्षेत्र के पास से ही NAT ,नार्थ अल्मोड़ा थ्रस्ट व अन्य भ्रंशों की उत्पत्ति व भूगर्भीय अस्थिरता बनी हुई है।
यदि इन चट्टानों के आधार बिंदु ( बेस) को ही काटा गया या यहां पर विस्फोट किया या जोर-जोर से दबाव डाला गया तो ओवरबर्डन पर दबाव पड़ेगा और परिणाम स्वरूप ऊपर वाली सड़क नीचे आ जायेगी। साथ ही क्षेत्र में चट्टानों की ढलान अस्थिरता और चट्टानों के खिसकने की दर और भी बढ़ती जाएगी।
यही से 500-600 मीटर आगे’ चमधार ‘में मोड़ से ठीक पहले श्रीनगर की ओर फ्रैक्चर्ड फिलाइट्स, सेल, क्वार्जाइट और लाइमस्टोन युक्त बड़ी ऊंचाई वाला भूस्खलन ज़ोन जो कि दोनों तरफ बडी तेजी से चौड़ाई में फैलता जा रहा है, पैदा हो चुका है जो कि पूरे क्षेत्र व क्षेत्र में बसी बस्तियों के लिए जी का जंजाल हो गया है।
वैसे भी इस क्षेत्र की चट्टानों का ‘डिपिंग इनक्लीनेशन ‘ (भार झुकावकोंण) अत्यधिक है जो कि कई जगहों पर 45°-60° के लगभग है। सड़कों के ऊपरी हिस्से के भूस्खलन को कम करने व रोकने केलिए ‘डिपिंग इनक्लीनेशन’ 30° से नीचे ही होना चाहिए।
अतः इस स्थान की सड़क को ऊपर वाली सड़क जो कि फरासू से लिंक है, को स्वीत -कोटेश्वर कालोनी के आसपास से राष्ट्रीय राजमार्ग नं58 पर जोड दिया जाना एक बेहतरीन बुद्धिमत्तापूर्ण व सुरक्षित विकल्प हो सकता है।
















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