विकासखंड कोट के अंतर्गत आने वाले फलस्वाड़ी गांव (सितोनस्यूं पट्टी) धार्मिक और ऐतिहासिक दृष्टि से अत्यंत पवित्र स्थल माना जाता है।
मान्यता है कि यहीं पर माता सीता ने भू-समाधि ली थी। इस पावन स्थल पर वर्षों से चलती आ रही परंपरा के रूप में हर वर्ष मंसार मेला आयोजित होता है।
इस वर्ष मेला रविवार, 02 नवम्बर को विधिवत रूप से आयोजित किया गया, जिसमें आसपास के गांवों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु जुटे।
स्थानीय श्रद्धालुओं ने पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ शोभायात्रा, दर्जनों धार्मिक तत्सम अनुष्ठान और खेत की प्रतीकात्मक खुदाई की।

मेला: आयोजन, परंपरा और गतिविधियाँ
इस वर्ष का मेला स्थानीय परंपरा के अनुरूप शुरू हुआ। रविवार सुबह देव गांव स्थित लक्ष्मण मंदिर से प्रारंभ होकर शोभायात्रा निकाली गई, जिसमें ढोल-दमाऊं, religious ध्वज-निशान और श्रद्धालुओं का जनसैलाब था।
कोटसाड़ा गांव के ग्रामीण रस्सी, दूण-कंडी (मिठाई की टोकरी) तथा पारंपरिक सामग्रियों के साथ मेले में शामिल हुए।
लस्वाड़ी पहुँचने पर निशान लगी लकड़ियों से खेत की प्रतीकात्मक खुदाई की गई, और श्रद्धालुओं ने चोटरी (शिलारूपी) दर्शन किए।
मेला स्थानीय संस्कृतिक कार्यक्रमों, लोकगीतों, ढोल-दमाऊं की थाप और श्रद्धा-भक्ति के संगम के रूप में देखा गया। समिति के पदाधिकारियों ने बताया कि मेले के आयोजन हेतु साफ-सफाई, पूजा-अर्चना, मीडिया प्रेस वार्ता तथा तीन-दिनिया कार्यक्रम की रूपरेखा बनाई गई थी।
इस मेला ने केवल धार्मिक आस्था का प्रसार नहीं किया, बल्कि क्षेत्र की लोक-संस्कृति, सामाजिक सहभागिता और स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी गति दी।
श्रद्धालुओं की उपस्थिति से मेले का उत्सव-माहौल बना रहा और आसपास के गांवों से आने-जाने वाले लोगों ने इस आयोजन को उत्सव के रूप में देखा।
मठ-मंदिरों, लोकपरंपराओं और आस्थाओं को जीवित रखने में ऐसे मेले महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। स्थानीय पुरोहित तथा समिति सदस्य इस बात पर जोर देते रहे हैं कि आने वाली पीढ़ियों के लिए इस पवित्र स्थल और उसकी कथा-परंपरा को जानना एवं समझना आवश्यक है।
धार्मिक मान्यता और पौराणिक कथा
फलस्वाड़ी गांव को हिन्दू मान्यताओं में विशेष स्थान प्राप्त है। कथा के अनुसार, जब भगवान राम ने माता सीता को वनवास भेजा था, तब उनके साथ चलने वाले भाई लक्ष्मण ने माता सीता को फलस्वाड़ी गांव में छोड़ दिया था बाद में यहीं पर उन्होंने धरती में समाकर भू-समाधि ली थी।
श्रद्धालुओं की मान्यता है कि इसी स्थान पर एक प्राचीन मंदिर भी था, जो समय के साथ भूमि-अंदर समा गया है। खुदाई के दौरान चट्टान-रूप शिलाएँ निकलती हैं, जिन्हें श्रद्धालु माता सीता के दर्शन के रूप में लेते हैं।



















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