सुमाड़ी से पानीपत तक धागों के जादूगर का सफर
गंगा असनोडा
भारतीय शिल्प और बुनकर कला को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई ऊंचाइयों पर ले जाने वाले प्रसिद्ध शिल्पकार खेमराज सुंदरियाल को केंद्र सरकार ने पद्म श्री सम्मान से अलंकृत किया है।
पौड़ी गढ़वाल के ग्राम सुमाड़ी में जन्मे सुंदरियाल जी ने अपनी अद्भुत प्रतिभा से न केवल उत्तराखंड का मान बढ़ाया है, बल्कि पारंपरिक बुनाई कला में नए प्राण फूँके हैं।
श्री सुंदरियाल सुमाड़ी निवासी प्रसिद्ध उद्योगपति एवं समाजसेवी सीए (CA) मोहन काला के सगे मामा हैं।
श्री काला अपने मामा की इस अभूतपूर्व उपलब्धि पर हर्ष व्यक्त करते हुए उनकी इस कला को उत्तराखंड के घर-घर तक पहुँचाने के लिए संकल्पित हैं।
शून्य से शिखर तक की यात्रा
सुंदरियाल जी का जीवन संघर्ष और साधना की एक मिसाल है। सुमाड़ी के ग्रामीण परिवेश से निकलकर उन्होंने आईटीआई (IIT) श्रीनगर से वीविंग का तकनीकी ज्ञान लिया।
इसके बाद दिल्ली के प्रतिष्ठित ‘दिल्ली क्लॉथ मिल’ (DCM) और बनारस के ‘बुनकर सेवा केंद्र’ में वर्षों तक अपने कौशल को तराशा।
वर्ष 2001 में सेवानिवृत्ति के बाद उन्होंने विश्राम करने के बजाय हरियाणा के पानीपत में अपना स्वयं का छोटा सा ‘खड्डी’ उद्योग स्थापित किया, जहाँ से उनकी कला का एक नया अध्याय शुरू हुआ।
धागों से रची अद्भुत कलाकृतियाँ

खेमराज सुंदरियाल जी ने बुनाई (Weaving) के क्षेत्र में वह कर दिखाया जिसकी कल्पना बुनकर जगत के दिग्गज भी नहीं कर सकते थे।
उन्होंने अपनी हथकरघा मशीन से भगवान गणपति, माता सरस्वती और अन्य देवी-देवताओं की ऐसी बारीकी से बुनी हुई कलाकृतियाँ तैयार कीं, जो देखने में किसी जीवंत चित्र जैसी लगती हैं।
उन्होंने देश के पूर्व राष्ट्रपतियों और कई महान हस्तियों के पोट्रेट्स भी धागों के माध्यम से उकेरे हैं।
उनकी इन कृतियों की दिल्ली और मुंबई जैसे महानगरों में लगी प्रदर्शनियों में भारी सराहना हुई है।
सम्मान और उपलब्धियाँ
84 वर्ष की आयु में भी कर्मठ सुंदरियाल जी को उनके असाधारण योगदान के लिए कई प्रतिष्ठित पुरस्कारों से नवाजा जा चुका है:
पद्म श्री: भारत सरकार द्वारा कला क्षेत्र में सर्वोच्च नागरिक सम्मान।
संत कबीर अवार्ड: बुनकर कला के क्षेत्र का सर्वोच्च सम्मान।
ललित कला अकादमी अवार्ड: कलात्मक उत्कृष्टता के लिए।
राज्य स्तरीय सम्मान: हाल ही में 15 अगस्त 2025 को हरियाणा के मुख्यमंत्री द्वारा विवर सेवा केंद्र के माध्यम से उन्हें सम्मानित किया गया।
भावी पीढ़ी के लिए मार्गदर्शक
आज भी सुंदरियाल जी उत्तर भारत के कई राज्यों में संस्थानों और युवाओं को इस कला का प्रशिक्षण दे रहे हैं।
उनकी प्रबल इच्छा है कि वे उत्तराखंड सरकार के सहयोग से अपने इस दुर्लभ हुनर को पहाड़ी क्षेत्र के युवाओं को सिखाएं, जिससे राज्य में स्वरोजगार के नए द्वार खुल सकें।
उनके भांजे मोहन काला इस पुनीत कार्य में उनका पूर्ण सहयोग कर रहे हैं ताकि उत्तराखंड की नई पीढ़ी इस हुनर को अपनाकर आत्मनिर्भर बन सके।



















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