खनन और पर्यावरणीय क्षरण की आशंका पर वेकेशन बेंच 29 दिसंबर को करेगी सुनवाई
सुप्रीम कोर्ट ने अरावली पहाड़ियों की परिभाषा में हालिया बदलाव से
उत्पन्न गंभीर पर्यावरणीय चिंताओं को लेकर स्वतः संज्ञान लिया है।
आशंका जताई जा रही है कि इस संशोधित परिभाषा से बिना रोक-टोक खनन
और बड़े पैमाने पर पर्यावरणीय गिरावट का रास्ता खुल सकता है।
इस मामले पर सोमवार, 29 दिसंबर को सुप्रीम कोर्ट की वेकेशन बेंच सुनवाई करेगी।
कौन करेगा सुनवाई
यह मामला चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्यकांत, जस्टिस जे के माहेश्वरी
और जस्टिस ए जी मसीह की पीठ के समक्ष सूचीबद्ध है।
परिभाषा बदलने से क्यों बढ़ी चिंता
अरावली क्षेत्र अपनी पारिस्थितिक संवेदनशीलता, मरुस्थलीकरण रोकने,
और भूजल स्तर बनाए रखने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।
संशोधित परिभाषा के बाद पर्यावरण समूहों और नागरिक समाज संगठनों ने आशंका जताई है
कि इससे पहले से संरक्षित इलाकों में खनन और निर्माण गतिविधियों को वैधता मिल सकती है,
जिससे दीर्घकालिक पर्यावरणीय नुकसान होगा।
पिछला फैसला और MoEF&CC की भूमिका
नवंबर 2025 में, तत्कालीन पीठ बी आर गवई, के विनोद चंद्रन और एन वी अंजारिया ने
खनन के संदर्भ में अरावली पहाड़ियों और पर्वतमालाओं के लिए पर्यावरण,
वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEF&CC) की समिति द्वारा सुझाई गई परिचालन परिभाषा को स्वीकार किया था।
संशोधित परिचालन परिभाषा
- “अरावली पहाड़ियाँ”: निर्दिष्ट जिलों में कोई भी भू-आकृति जिसकी न्यूनतम ऊँचाई 100 मीटर (स्थानीय राहत से) हो, जिसमें सहायक ढलान और जुड़ी भू-आकृतियाँ शामिल हैं।
- “अरावली पर्वतमाला”: जब ऐसी दो या अधिक पहाड़ियाँ 500 मीटर के दायरे में स्थित हों।
कोर्ट का स्पष्ट निर्देश
कोर्ट ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया था कि पारिस्थितिक रूप से नाजुक क्षेत्र में
किसी भी नई खनन गतिविधि की अनुमति देने से पहले सतत खनन के लिए व्यापक प्रबंधन योजना (MPSM) तैयार की जाए।
क्यों अहम है यह मामला
यह विवाद दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान और गुजरात में अरावली की विरोधाभासी परिभाषाओं से जुड़ा रहा है,
जिसके चलते अतीत में नियामक खामियाँ और अवैध खनन सामने आए।
सुप्रीम कोर्ट का ताज़ा हस्तक्षेप इसीलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
















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