जेंडर बराबरी की दिशा में बड़ा कदम, SSC महिला अधिकारियों के साथ भेदभाव माना
Supreme Court of India ने आर्म्ड फोर्स में महिलाओं के साथ हो रहे व्यवस्थागत भेदभाव को मानते हुए एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है।
अदालत ने स्पष्ट किया कि शॉर्ट सर्विस कमीशन (SSC) की महिला अधिकारियों को भी परमानेंट कमीशन पाने का पूरा अधिकार है।
क्या है पूरा मामला
यह मामला सेना और नौसेना में कार्यरत महिला SSC अधिकारियों को परमानेंट कमीशन न दिए जाने से जुड़ा था।
कोर्ट ने पाया कि यह केवल व्यक्तिगत मामलों का मुद्दा नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम में मौजूद भेदभाव का परिणाम है।
तीन जजों की बेंच ने सुनाया फैसला
यह फैसला Justice Surya Kant की अध्यक्षता वाली बेंच ने दिया, जिसमें Justice Ujjal Bhuyan और Justice N. Kotiswar Singh शामिल थे।
बेंच ने कहा:
“पुरुष SSC अधिकारी यह उम्मीद नहीं कर सकते कि परमानेंट कमीशन सिर्फ उन्हीं के लिए होगा।”
कोर्ट ने मानी ‘सिस्टमिक भेदभाव’ की बात
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि महिला अधिकारियों को परमानेंट कमीशन न देना,
पुराने और जमे हुए मूल्यांकन सिस्टम में मौजूद भेदभाव का नतीजा है।
- महिला अधिकारियों की ACR (Annual Confidential Reports) इस धारणा के साथ तैयार की गईं कि वे कभी परमानेंट कमीशन के लिए योग्य नहीं होंगी
- इससे उनके करियर और प्रमोशन पर नकारात्मक असर पड़ा
- पुरुष अधिकारियों के मुकाबले उन्हें कमतर आंका गया
250 की लिमिट को बताया मनमाना
कोर्ट ने हर साल सिर्फ 250 महिला अधिकारियों को परमानेंट कमीशन देने की सीमा को “मनमाना” और असंवैधानिक बताया।
अनुच्छेद 142 का इस्तेमाल
अदालत ने Article 142 of Indian Constitution के तहत अपनी विशेष शक्तियों का उपयोग करते हुए महिलाओं को पूरा न्याय देने का आदेश दिया।
महिला अधिकारियों को मिलेगा पूरा लाभ
कोर्ट ने निर्देश दिया कि:
- जिन महिला अधिकारियों को परमानेंट कमीशन नहीं मिला, उन्हें 20 साल की सेवा पूरी मानकर रिटायरमेंट लाभ दिए जाएं
- यह आदेश उन अधिकारियों पर भी लागू होगा जिन्हें 2020 के बाद कमीशन मिला, लेकिन मूल्यांकन सही तरीके से नहीं हुआ
नौसेना के लिए विशेष निर्देश
Indian Navy के मामले में कोर्ट ने कहा कि:
- एक बार के उपाय के तहत योग्य महिला अधिकारियों को मेडिकल फिटनेस के आधार पर परमानेंट कमीशन दिया जाए
- 2009 के बाद शामिल हुई महिला अधिकारी इस अधिकार की पात्र होंगी
क्यों है यह फैसला अहम
यह फैसला केवल एक कानूनी जीत नहीं, बल्कि भारतीय सशस्त्र बलों में जेंडर समानता की दिशा में ऐतिहासिक कदम माना जा रहा है।
इससे भविष्य में महिलाओं के लिए करियर के अवसर और मजबूत होंगे।
















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