पर्यावरण और पर्यटन पर असर
उत्तराखंड में हिमालयी क्षेत्रों में बर्फबारी अब पहले जैसी नियमित नहीं रही।
वर्ष 2022 से 2026 तक के आधिकारिक आंकड़े और मीडिया रिपोर्ट बताते हैं कि बर्फ गिरने का समय,
क्षेत्रीय फैलाव और तीव्रता लगातार बदल रहे हैं।
यह बदलाव न केवल पर्यावरणीय संतुलन बल्कि पर्यटन उद्योग पर भी असर डाल रहा है।
2022–2023: परंपरागत लेकिन सीमित बर्फबारी
- दिसंबर 2022 और जनवरी 2023 में उच्च हिमालयी क्षेत्रों में मौसमी बर्फबारी हुई।
- अधिकांश मिड-हिमालय और निचले इलाकों में बर्फ कम रही।
- यह पैटर्न पुराने मौसम आंकड़ों के अनुरूप था।
2024: फरवरी की शुरुआत में बर्फबारी
- 2–5 फरवरी 2024 को केदारनाथ, बद्रीनाथ, हेमकुंड साहिब, औली, हर्षिल और मुनस्यारी में विस्तृत snowfall दर्ज हुई।
- फरवरी के बाद मार्च–अप्रैल में कोई नई बर्फबारी नहीं हुई।
- यह दिखाता है कि बर्फबारी का समय अब परंपरागत सर्दियों से खिसक रहा है।
2025: अक्टूबर में असामान्य बर्फ और दिसंबर में सूखा
- 6–8 अक्टूबर 2025: केदारनाथ, बद्रीनाथ, हेमकुंड साहिब, औली और मुनस्यारी में असामान्य जल्दी बर्फबारी हुई।
- दिसंबर 2025: पूरा महीना लगभग शुष्क रहा; IMD के अनुसार राज्य में मापनीय snowfall नहीं हुई।
- यह दशकों में दुर्लभ स्थिति थी।
2026: अब तक केवल केदारनाथ में बर्फ
- 5 जनवरी 2026 तक केदारनाथ में ही पुष्ट snowfall दर्ज हुई है।
- औली, चोपता, हर्षिल और मुनस्यारी जैसे प्रमुख पर्यटन स्थल अभी भी बर्फ की प्रतीक्षा कर रहे हैं।
- पर्यटकों और स्थानीय व्यवसायों में अनिश्चितता और निराशा देखी जा रही है।
बर्फबारी में कमी के असर (Impact)
1- पुष्ट बदलाव: Om Parvat का снег गायब होना
हिमालय के कुछ इलाकों में सबसे प्रतीकात्मक बदलाव Om Parvat में देखा गया:
इस पर्वत पर पहली बार पूरी तरह से बर्फ गायब हो गई थी, जो हमेशा से बर्फ से ढकी रहती थी। विशेषज्ञों ने इसे बर्फबारी की कमी और ग्लोबल वार्मिंग जैसे पर्यावरणीय कारणों से जोड़ा है।
2- बदलते पैटर्न के अधिकारिक कारण
मौसम और पर्यावरण विशेषज्ञों के मुताबिक, हिमालयी बर्फबारी पैटर्न में बदलाव के पीछे ये वैज्ञानिक रूप से पुष्टि किए गए कारण हैं:
I- कमजोर Western Disturbances
ये पश्चिमी विक्षोभ सर्दियों में बारिश और बर्फ ले आते हैं। लेकिन अब इनकी आवृत्ति और तीव्रता कम हो रही है, जिससे बारिश और snowfall दोनों घट रहे हैं।
II- ग्लोबल वार्मिंग और तापमान में वृद्धि
खासतौर पर उच्च हिमालय में तापमान बढ़ रहा है, जिससे snowfall की संभावना कम और snow melt तेज होती जा रही है।
III- बारिश/बर्फ दोनों में कमी
IMD के डेटा में हिमालय के अन्य हिस्सों (जैसे हिमाचल तथा जम्मू-कश्मीर) के साथ-साथ उत्तराखंड में भी snowfall deficit लगातार देखा जा रहा है।
3- पर्यावरण और पारिस्थितिकी पर असर
- ग्लेशियर और नदियों को खतरा:
लगातार कम snowfall से ग्लेशियर recharge कम होता है। इससे लांग-टर्म में नदियों का बेस-फ्लो प्रभावित हो सकता है, जो पारिस्थितिक संतुलन को बिगाड़ता है। - बर्फ की अनुपस्थिति और हिमनद रिसर्शन:
जैसे Om Parvat का snow cover गायब होना – यह संकेत है कि हिमनदों का ध्रुवीय बर्फ क्षेत्र धीरे-धीरे सिकुड़ रहा है। - उत्तराखंड की संवेदनशीलता:
ग्लेशियर-अवस्थित पारिस्थितिक प्रणालियों में बदलाव से soil moisture, flora–fauna cycles पर भी लंबी अवधि में दबाव पड़ सकता है।
शोध बताते हैं कि हिमालयी क्षेत्र में पिछले सालों से snowfall पैटर्न असामान्य रहे हैं।
4- पर्यटन पर असर
- बर्फ न होने से पर्यटन कम:
स्कीइंग और winter adventure पर्यटन के लोकप्रिय स्थल जैसे औली, चोपता, हर्षिल को अपेक्षित snowfall नहीं मिल रही है, जिससे लोग tourist rush कम महसूस कर रहे हैं। - बहुत से पर्यटक निराश हुए:
पिछले वर्षों में कई पर्यटक महसूस कर रहे हैं कि पहाड़ों पर बर्फ की कमी से विंटर ट्रैवल अनुभव प्रभावित हुआ है।
विशेषज्ञों की राय
- पश्चिमी विक्षोभ (Western Disturbances) अब कमजोर और अनियमित हो गए हैं।
- हिमालय में औसत तापमान में वृद्धि और लंबे शुष्क दौर के कारण snowfall का पैटर्न बदल रहा है।
- यह एक साल का बदलाव नहीं, लगातार कई वर्षों का ट्रेंड है।
ये सभी संकेत देते हैं कि जलवायु परिवर्तन और हिमालयी मौसम पैटर्न में बदलाव राज्य के पर्यावरण और पर्यटन पर दीर्घकालिक प्रभाव डाल रहे हैं।


















Leave a Reply