चौखुटिया में दिनदहाड़े तेंदुआ, पौड़ी में भालू ने उजाड़ा पूरा गांव
उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में मानव–वन्यजीव संघर्ष लगातार गंभीर होता जा रहा है।
जंगलों से निकलकर तेंदुआ और भालू अब सीधे आबादी वाले इलाकों तक पहुंच चुके हैं।
हालात ऐसे बन गए हैं कि डर अब सिर्फ जंगलों तक सीमित नहीं रहा।
चौखुटिया में दिन में दिखा तेंदुआ, गांव में दहशत
अल्मोड़ा जिले के चौखुटिया क्षेत्र में मंगलवार को दिनदहाड़े तेंदुआ दिखाई दिया।
ग्राम पंचायत टटलगांव में झूला ढाबा के पास तेंदुआ अपने बच्चों के साथ खुलेआम घूमता नजर आया।
दिन के उजाले में तेंदुए की मौजूदगी से ग्रामीणों में डर फैल गया।
लोगों का कहना है कि पहले तेंदुए रात में दिखाई देते थे, लेकिन अब दिन में भी उनका गांव के भीतर आना चिंता बढ़ा रहा है।
सर्दियों के साथ बढ़ा भालुओं का खतरा
उत्तराखंड में ठंड बढ़ने के साथ भालुओं का आतंक भी बढ़ गया है।
कई जिलों में भालू अब सिर्फ हमले नहीं कर रहे, बल्कि गांवों में लगातार चहलकदमी कर रहे हैं।
ग्रामीणों का कहना है कि:
- शाम ढलते ही बाहर निकलना मुश्किल हो गया है
- मवेशियों पर हमले आम हो गए हैं
- डर के कारण लोग खेतों तक नहीं जा पा रहे
पौड़ी के बस्ताग गांव की दर्दनाक कहानी
पौड़ी जिले के पोखड़ा क्षेत्र की पणिया ग्राम सभा का तोक गांव बस्ताग भालू के आतंक की सबसे बड़ी मिसाल बन गया है।
यहां पिछले पांच वर्षों से केवल हरीश प्रसाद नौटियाल का परिवार ही रह रहा था।
एक सप्ताह में खत्म हो गई पूरी आजीविका
हरीश प्रसाद का परिवार खेती और पशुपालन पर निर्भर था।
उनके पास थे:
- दो दुधारू गाय
- बैलों की एक जोड़ी
- दो बकरियां
बीते एक सप्ताह में भालू ने एक-एक कर सभी मवेशियों को मार डाला।
इसके बाद भालू का घर के आंगन तक आना परिवार के लिए बड़ा खतरा बन गया।
डर के आगे मजबूरी, गांव छोड़ना पड़ा
लगातार डर और नुकसान के चलते परिवार ने पैतृक घर छोड़ने का फैसला किया।
हरीश प्रसाद, उनकी पत्नी जसोदा देवी, बेटा संजय और बेटी शांति अब पड़ोसी गांव पणिया में शरण लिए हुए हैं।
परिवार के जाने के बाद बस्ताग गांव पूरी तरह खाली हो गया है।
अब वहां सिर्फ सन्नाटा बचा है।
हरीश प्रसाद कहते हैं “भालू ने हमारे मवेशी ही नहीं मारे, हमारी पूरी जिंदगी उजाड़ दी।”
पहले पलायन, अब डर ने बुझा दी आखिरी उम्मीद
ग्राम प्रधान हर्षपाल सिंह नेगी के अनुसार, करीब 15 साल पहले बस्ताग में 18 परिवार रहते थे।
सड़क और सुविधाओं की कमी के कारण धीरे-धीरे लोग पलायन करते चले गए।
कोरोना काल में कुछ लोग लौटे जरूर, लेकिन अब वन्यजीवों के डर ने गांव में बसने की आखिरी उम्मीद भी खत्म कर दी।
वन विभाग का आश्वासन, लेकिन चिंता बरकरार
पोखड़ा रेंज के रेंज अधिकारी नक्षत्र शाह का कहना है कि प्रभावित परिवार को सुरक्षा उपलब्ध कराने की कोशिश की जा रही है।
ताकि वे दोबारा गांव लौट सकें।
हालांकि ग्रामीणों का कहना है कि सिर्फ आश्वासन से डर खत्म नहीं होगा।
बढ़ता संकट, सरकार के लिए चेतावनी
चौखुटिया में दिनदहाड़े तेंदुआ दिखना और पौड़ी में भालू के कारण गांव का खाली होना
यह साफ संकेत देता है कि उत्तराखंड में मानव–वन्यजीव संघर्ष गंभीर स्तर पर पहुंच चुका है।
अगर समय रहते:
- नियमित गश्त
- मुआवजा
- सुरक्षा उपाय
- और स्थायी समाधान
नहीं किए गए, तो पहाड़ों से पलायन और तेज हो सकता है।
















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