यूनिवर्सिटी ग्रांट कमीशन (UGC) द्वारा लागू किए गए Promotion of Equity in Higher Education Institutions Regulations, 2026 को लेकर देशभर में विरोध तेज हो गया है। यूनिवर्सिटी कैंपस से लेकर सड़कों तक इन नियमों के खिलाफ आवाज़ उठाई जा रही है,
UGC के नए नियमों का मकसद उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव को रोकना बताया गया है। नियमों के तहत हर विश्वविद्यालय और कॉलेज में इक्विटी कमेटी बनाना अनिवार्य किया गया है,
जिसमें SC, ST, OBC, दिव्यांग और महिला प्रतिनिधियों की भागीदारी जरूरी होगी। यह कमेटी भेदभाव से जुड़ी शिकायतों की सुनवाई और समयबद्ध निपटारा करेगी।
क्यों लाने पड़े ये नियम
UGC ने ये नियम सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद बनाए हैं। वर्ष 2025 में रोहित वेमुला और पायल तड़वी जैसे मामलों की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने UGC को 2012 के पुराने नियमों को सख्त और प्रभावी बनाने का आदेश दिया था। इन मामलों में कथित जातिगत उत्पीड़न के बाद आत्महत्या की घटनाएं सामने आई थीं।
किस रिपोर्ट के आधार पर बने नियम
UGC द्वारा सुप्रीम कोर्ट में पेश की गई रिपोर्ट के अनुसार, उच्च शिक्षण संस्थानों में जाति आधारित भेदभाव की शिकायतें लगातार बढ़ी हैं।
- 2017-18 में 173 शिकायतें
- 2023-24 में बढ़कर 378 शिकायतें
यानी करीब 118 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई। रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि जहां अधिकांश मामलों का निपटारा हुआ, वहीं लंबित मामलों की संख्या भी बढ़ी है।
विरोध क्यों
शिक्षाविदों और कुछ संगठनों का कहना है कि नए नियमों से विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता प्रभावित होगी, जबकि समर्थकों का मानना है कि यह कदम कैंपस में समानता और सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए जरूरी है।
फिलहाल UGC के नए नियमों को लेकर बहस जारी है और सरकार की ओर से विरोध पर कोई आधिकारिक संशोधन संकेत नहीं दिया गया है।
















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