कपिलेश भोज को मिला उमेश डोभाल सम्मान 2025
हिमांशु जोशी
पत्रकारिता सिर्फ खबरों का माध्यम नहीं, बल्कि समाज का आईना होती है. इसी आईने में झांकने की कोशिश उमेश डोभाल स्मृति समारोह 2026 में दिखाई दी, जहां उत्तराखंड की पत्रकारिता के वर्तमान और भविष्य पर गंभीर चर्चा हुई. ट्रस्ट द्वारा उमेश डोभाल स्मृति सम्मान 2025 कपिलेश भोज को दिया गया.
उमेश डोभाल स्मृति समारोह 2026 का मुख्य विषय इस बार उत्तराखंड की वर्तमान पत्रकारिता रहा. इस गरिमामय आयोजन में राज्य के वरिष्ठ पत्रकारों, लेखकों और बुद्धिजीवियों ने वर्तमान दौर के संकटों और डिजिटल युग की संभावनाओं पर विस्तार से मंथन किया. प्रदेश बनने के बाद यहां बड़ी संख्या में समाचार पोर्टल भी सामने आए हैं, जिन्होंने पत्रकारिता के दायरे को और व्यापक किया है. अब किसी दूरस्थ गांव में जल, जंगल और जमीन से जुड़ी समस्या भी सीधे दुनिया के सामने लाई जा सकती है, जिससे स्थानीय मुद्दों को नई दृश्यता मिली है.
डिजिटल क्रांति: दूर दराज की आवाज़ के लिए नया आसमान
डिजिटल पत्रकारिता ने सूचनाओं के प्रवाह का लोकतंत्रीकरण कर दिया है. अब पत्रकारिता किसी बड़े शहर या रसूखदार मीडिया हाउस की जागीर नहीं रही. एक स्मार्टफोन के जरिए पहाड़ के आखिरी गांव में बैठा व्यक्ति भी अपनी आवाज़ उठा सकता है. पहले खबरें दफ्तरों तक पहुँचने में हफ्तों लग जाते थे, लेकिन अब वे सेकंडों में दुनिया के सामने होती हैं. इसने उन स्थानीय मुद्दों को भी चर्चा के केंद्र में ला दिया है, जिन्हें मुख्यधारा का मीडिया अक्सर नजरअंदाज कर देता था.
विज्ञापनों का संकट: छोटे अखबारों पर दोहरी मार
पिथौरागढ़ के वरिष्ठ पत्रकार बद्रीदत्त कसनियाल ने विज्ञापनों की असमानता का मुद्दा उठाते हुए एक बार कहा था कि पहले के मुकाबले अब छोटी पत्रिकाओं को चलाना कठिन होता जा रहा है क्योंकि उन्हें पर्याप्त विज्ञापन नहीं मिलते.
उत्तराखंड में विज्ञापन वितरण की यह असमानता एक बड़ी समस्या बनती जा रही है. बड़े मीडिया घरानों को जहां करोड़ों के विज्ञापन मिलते हैं, वहीं छोटे अखबार और पत्रिकाएं लगातार आर्थिक संकट से जूझ रहे हैं. यह स्थिति केवल संस्थानों की नहीं, बल्कि जमीनी पत्रकारिता की निरंतरता के लिए भी गंभीर चुनौती है.
बाजार का चश्मा बनाम पहाड़ की जमीनी हकीकत
आज की मुख्यधारा की पत्रकारिता काफी हद तक बाजार केंद्रित हो गई है. दिल्ली और बड़े शहरों के मीडिया हाउस उत्तराखंड को अक्सर सिर्फ पर्यटन, चारधाम यात्रा या खूबसूरत वादियों के नजरिए से ही देखते हैं. इस चमक धमक के बीच पहाड़ की असली चुनौतियां जैसे जल संकट, बेतहाशा पलायन और बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव अक्सर दब जाते हैं. असली पत्रकारिता वही है जो केवल टूरिज्म की फोटो न दिखाए, बल्कि उन लोगों के जीवन की बात करे जो इस कठिन भूगोल में संघर्ष कर रहे हैं.
इतिहास की विरासत: आंदोलन, पत्रकारिता और सवाल पूछने की परंपरा
इतिहासकार शेखर पाठक ने कहा कि एक शताब्दी पहले कुमाऊं परिषद ने करीब दस साल तक उत्तराखंड में कुली बेगार जैसे आंदोलनों को संगठित रूप से चलाया. उस दौर में बड़ी संख्या में बुद्धिजीवी इन आंदोलनों से जुड़े थे. 1915 में तारा गैरोला को ब्रिटिश शासन से सवाल पूछने के लिए नामित किया गया. यह वह समय था जब पत्रकारिता सत्ता से सीधे जवाब मांगने का जरिया थी.
उन्होंने बताया कि अल्मोड़ा उस दौर में आंदोलनों का प्रमुख केंद्र था. कुमाऊं परिषद से जुड़े लोगों ने उस समय हुए चुनावों में करीब 90 प्रतिशत वोट हासिल कर विपक्षियों की जमानत जब्त करा दी. यह पहली बार था जब आंदोलन से जुड़े लोग चुनाव जीतकर जनप्रतिनिधि बने.
उस दौर की पत्रकारिता पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि अखबार सीधे और कठिन सवाल उठाते थे, जैसे कितने लोग बाघ के हमलों में मारे गए और कितने स्कूल बने. यही वजह थी कि उस समय की पत्रकारिता को स्वर्णिम दौर कहा जाता है. उसी समय शुरू हुआ शक्ति अखबार आज अपने सौ साल पूरे कर चुका है, जबकि गढ़वाली जैसे अखबार भी निकल रहे थे. इन अखबारों के संपादकीय बेहद धारदार और पढ़ने लायक होते थे.
उन्होंने कहा कि आज स्थिति बदल गई है. कॉरपोरेट पत्रकारिता के बढ़ते प्रभाव में स्थानीय आवाजों को बनाए रखना मुश्किल हो गया है. उत्तराखंड की पत्रकारिता के ये पच्चीस साल कहीं न कहीं विवशता के साल भी रहे हैं, जहां संसाधनों से ज्यादा समझौते नजर आते हैं. उन्होंने यह भी कहा कि अंकिता जैसे मामले भी कई बार अखबारों की हेडलाइन नहीं बन पाते, जो पत्रकारिता की प्राथमिकताओं पर सवाल खड़े करता है.
बदलता दौर और ‘रीजनल रिपोर्टर’ का प्रयोग
समारोह में इस बात पर जोर दिया गया कि तकनीक के साथ कदम मिलाना ही भविष्य की राह है। इसका एक जीवंत उदाहरण ‘रीजनल रिपोर्टर’ के रूप में सामने आया है। प्रिंट के बढ़ते खर्च और सीमित संसाधनों के बीच, ‘रीजनल रिपोर्टर’ ने हार मानने के बजाय खुद को बदला। इसे न केवल पीडीएफ फॉर्मेट में ढाला गया, बल्कि मासिक पत्रिका से साप्ताहिक पत्र के रूप में बदलकर इसकी धार को और तेज किया गया। डिजिटल माध्यमों पर इसकी सशक्त मौजूदगी आज दूरदराज के क्षेत्रों की आवाज बन रही.


















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