सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल से जुड़े एक PIL (जनहित याचिका) पर सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार से यह स्पष्ट करने का आदेश दिया है कि क्या सिर्फ बंगाली भाषा बोलने को ही किसी व्यक्ति की विदेशी पहचान का संकेत माना जा रहा है-विशेषकर बांग्लादेशी नागरिक होने के संदर्भ में।
यह PIL पश्चिम बंगाल माइग्रेंट वर्कर्स वेलफेयर बोर्ड और उसके अध्यक्ष, तृणमूल सांसद समीरुल इस्लाम द्वारा दायर की गई है।
याचिका में आरोप लगाया गया है कि कई राज्यों में बंगाली बोलने वाले प्रवासी मजदूरों को बिना नागरिकता का प्रमाण-पत्र दिखाए गिरफ्तार कर लिया जा रहा है या उन्हें बांग्लादेश भेज दिया जा रहा है।
अदालत का रुख और दिशा-निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से एक हफ्ते के भीतर विस्तृत हलफ़नामा दाखिल करने का निर्देश दिया है। साथ ही, संबंधित केंद्र और राज्यों (जैसे ओडिशा, राजस्थान, दिल्ली, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश और गुजरात सहित कुल 10) से जवाब मांगा गया है।
अदालत ने यह स्पष्ट किया है कि सीमा-पार रोके जाने और देशों के भीतर हिरासत के बीच अंतर होना चाहिए—जब कोई भारत में प्रवेश कर चुका है, तो उसकी नागरिकता निर्धारित करने के लिए उचित प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए।
अस्थायी आदेश जारी करने से इनकार
अदालत ने किसी तत्काल रोक (interim order) देने से इनकार कर दिया, यह बताते हुए कि इससे कानून-प्रवासी और कानूनी नागरिकों पर गलत प्रभाव पड़ सकता है।
साथ ही, यह सुझाव भी दिया गया कि एक केंद्रीय ‘नोडल एजेंसी’ बनाई जाए, जो प्रवासी मजदूरों के मूल और कार्यस्थल राज्यों के बीच समन्वय स्थापित करे और नागरिकता सत्यापन प्रक्रिया को सुव्यवस्थित करे।
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों का स्वागत करते हुए इसे बंगाली प्रवासियों के लिए एक बड़ी राहत बताया।
उन्होंने कहा कि बंगाल की ऐतिहासिक भूमिका जहाँ कई पीढ़ियों ने शरण और संस्कृति प्रदान की है, अदालत की टिप्पणी ने आशा जगा दी है। TMC ने इस घटना को राजनीतिक हमला बताते हुए BJP की “Bangla Birodhi” (बंगाली विरोधी) नीति पर निशाना साधा।
अतिरिक्त घटनाक्रम
- खस्तौर पर अवैध हिरासत के आरोप: पश्चिम बंगाल सरकार ने शिकायत की थी कि ओडिशा में 227 बंगाली प्रवासी मजदूरों को “बांग्लादेशी” मानकर हिरासत में लिया गया था।
- लोकल न्यायालय की प्रतिक्रिया: कोलकाता HC ने दिल्ली सरकार से पूछा था—क्या प्रवासी मजदूरों को हिरासत में लिया गया था, और अगर हाँ, तो किन आधारों पर? इस पर दस्तावेज़ जमा करने का निर्देश दिया गया था।
- जनहित और सांस्कृतिक अबाधरता: PIL में उठाए गए संवैधानिक प्रश्न—अदालत ने कहा कि राष्ट्रीय सुरक्षा और सांस्कृतिक एकता, दोनों संवेदनशील मुद्दे हैं। भाषा को ही पहचान के लिए आधार बनाना न्यायसंगत नहीं है।

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