ओल चिकी लिपि में उपलब्ध हुआ संविधान
आदिवासी भाषाओं के संरक्षण की दिशा में ऐतिहासिक पहल
राष्ट्रपति भवन में आयोजित एक गरिमामय समारोह में गुरुवार को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने
संथाली भाषा में भारत के संविधान का औपचारिक विमोचन किया।
अब भारत का संविधान संथाली भाषा में ओल चिकी लिपि में उपलब्ध होगा।
इस अवसर पर उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन भी उपस्थित रहे।
संविधान की समझ मातृभाषा में
उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन ने इस पहल को संथाली भाषी समाज के लिए “ऐतिहासिक महत्व” का बताया।
उन्होंने कहा कि मातृभाषा में संविधान उपलब्ध होने से लोग इसके मूल्यों,
अधिकारों और कर्तव्यों को बेहतर ढंग से समझ सकेंगे,
जिससे लोकतांत्रिक चेतना और संवैधानिक जागरूकता सशक्त होगी।
ओल चिकी लिपि में प्रकाशित
उपराष्ट्रपति के आधिकारिक एक्स (पूर्व ट्विटर) हैंडल पर साझा पोस्ट में बताया गया कि
राष्ट्रपति भवन में आयोजित समारोह में ओल चिकी लिपि में लिखे गए संथाली संस्करण का विमोचन किया गया।
पोस्ट में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को इस पहल के लिए धन्यवाद देते हुए कहा गया कि
उनके मार्गदर्शन में यह महत्वपूर्ण कार्य संपन्न हुआ।
आदिवासी विरासत को मिला सम्मान
पोस्ट में यह भी उल्लेख किया गया कि जब द्रौपदी मुर्मू झारखंड की राज्यपाल थीं,
तब उन्होंने आदिवासी कल्याण, संस्कृति और भाषाओं के संरक्षण के लिए कई पहलें की थीं।
राष्ट्रपति बनने के बाद भी उन्होंने उसी विरासत को आगे बढ़ाते हुए
आदिवासी भाषाओं को राष्ट्रीय मंच पर सम्मान दिलाने का कार्य जारी रखा है।
आठवीं अनुसूची में शामिल संथाली भाषा
राष्ट्रपति मुर्मू ने अपने संबोधन में कहा कि ओल चिकी लिपि में संथाली भाषा में संविधान का प्रकाशन
समस्त संथाली समुदाय के लिए गर्व और प्रसन्नता का विषय है।
इससे ओडिशा, झारखंड, पश्चिम बंगाल, असम और बिहार में रहने वाले संथाली लोग संविधान के अनुच्छेदों को अपनी मातृभाषा में गहराई से समझ सकेंगे।
गौरतलब है कि संथाली भाषा को वर्ष 2003 में 92वें संविधान संशोधन अधिनियम के माध्यम से
संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किया गया था।
यह भारत की सबसे प्राचीन जीवित भाषाओं में से एक मानी जाती है
और देश के पूर्वी क्षेत्रों में बड़ी संख्या में आदिवासी समुदाय द्वारा बोली जाती है।

















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