आस्था और संस्कृति का दिखा अद्भुत संगम
जनपद पौड़ी गढ़वाल के खिर्सू क्षेत्र के ग्वाड़–कोठगी गांवों में इस वर्ष भी पारंपरिक कठबद्दी मेले
का आयोजन बड़े उत्साह और श्रद्धा के साथ किया गया।
यह मेला हर साल दोनों गांवों में बारी-बारी से आयोजित होता है और इस बार कोठगी गांव में इसका भव्य आयोजन हुआ।
देव पूजा से हुई मेले की शुरुआत
रविवार को देवताओं की विधिवत पूजा-अर्चना के साथ मेले की शुरुआत हुई।
इसके बाद रातभर ढोल-दमाऊं की थाप, जागरण और देव मंडाण के चलते पूरा वातावरण भक्तिमय बना रहा।
ग्रामीणों और श्रद्धालुओं ने पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ देवताओं का आह्वान किया और मेले में आध्यात्मिक ऊर्जा का माहौल देखने को मिला।
कठबद्दी रस्म ने खींचा सबका ध्यान
सोमवार सुबह देव स्नान और विधिवत पूजा के बाद कुल देवताओं का आह्वान किया गया, जिसके साथ कठबद्दी की पारंपरिक रस्म निभाई गई।
पंचायत चौक में कठबद्दी को पारंपरिक वेशभूषा, पगड़ी, लाल टीका और तलवारों से सजाया गया।
इसके बाद ढोल-दमाऊं की थाप पर इसे रस्सियों के सहारे लगभग 300 मीटर तक खिसकाया गया।
इस अद्भुत दृश्य को देखकर श्रद्धालु भावविभोर हो उठे और पूरे क्षेत्र में जयकारों की गूंज सुनाई दी।
बड़ी संख्या में जुटे ग्रामीण और प्रवासी
मेले में स्थानीय ग्रामीणों के साथ-साथ बड़ी संख्या में प्रवासी भी शामिल हुए।
दूर-दराज से आए लोगों ने अपनी जड़ों से जुड़कर इस परंपरा में भाग लिया और आस्था का अनुभव किया।
मंत्री धन सिंह रावत भी रहे मौजूद
इस अवसर पर प्रदेश के कैबिनेट मंत्री Dhan Singh Rawat भी मेले में मौजूद रहे।
उन्होंने कठबद्दी मेले को क्षेत्र की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान बताते हुए कहा कि इसकी जानकारी यूनेस्को तक पहुंचाने के प्रयास किए जाएंगे, ताकि इस परंपरा को वैश्विक पहचान मिल सके।
कठबद्दी: आस्था और परंपरा का प्रतीक
मंदिर के पुजारी सोहन सिंह रावत के अनुसार, कठबद्दी मेला केवल धार्मिक आयोजन नहीं है,
बल्कि यह प्रवासी ग्रामीणों को जोड़ने वाला एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक उत्सव भी है।
गढ़वाली भाषा में ‘कठबद्दी’ का अर्थ ‘कठ’ यानी खिंचाव या खिसकाना और ‘बद्दी’ यानी रस्म या परंपरा है।
इस अनुष्ठान में कुल देवताओं के प्रतीक चिन्हों को रस्सियों के सहारे एक निश्चित दूरी तक खिसकाया जाता है, जिसे अत्यंत पवित्र माना जाता है।
गांव की एकता और देवशक्ति का प्रतीक
मान्यता है कि यह परंपरा गांव की सुरक्षा, समृद्धि और अच्छी फसल की कामना के लिए निभाई जाती है।
कठबद्दी रस्म गांव की एकता और देवशक्ति का प्रतीक मानी जाती है।
सामूहिक भागीदारी के साथ निभाई जाने वाली यह परंपरा यह संदेश देती है कि गांववासी मिलकर हर कठिनाई का सामना कर सकते हैं।
ढोल-दमाऊं की थाप, पारंपरिक वेशभूषा और जयकारों के बीच यह मेला गढ़वाल की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को जीवंत करता है।

















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