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सरोकारों से साक्षात्कार

“भाषा से राष्ट्र की पहचान”- श्रीनगर (गढ़वाल) में गूंजा हिंदी का स्वर

समन्वयकर्ता सम्मेलन बना प्रेरणा मंच

जब मंच सजा, दीप जला और सरस्वती वंदना की स्वर-लहरियाँ गूंजीं-तो साफ था कि यह कोई सामान्य कार्यक्रम नहीं,

बल्कि हिंदी के भविष्य को दिशा देने वाला मंच बनने जा रहा है।

केन्द्रीयकृत प्रशिक्षण केन्द्र (CTC), SSB श्रीनगर के कला केन्द्र में आयोजित

हिंदी समन्वयकर्ता सम्मेलन ने न केवल प्रशासनिक दायरे में हिंदी के उपयोग को मजबूती दी,

बल्कि इसे भाव, तकनीक और संस्कृति से जोड़ने का संदेश भी दिया।

इस सम्मेलन का आयोजन केन्द्रीय विद्यालय SSB श्रीनगर और CTC SSB के संयुक्त तत्वावधान में, नगर राजभाषा कार्यान्वयन समिति हरिद्वार तथा THDC India Limited ऋषिकेश के सहयोग से किया गया।

दीप से संवाद तक: शुरुआत में ही दिखा सांस्कृतिक गौरव

दीप प्रज्वलन के साथ जैसे ही कार्यक्रम का शुभारंभ हुआ, माहौल में सकारात्मक ऊर्जा भर गई।
केन्द्रीय विद्यालय के विद्यार्थियों की सरस्वती वंदना और उत्तराखण्डी लोक नृत्य-संगीत ने

कार्यक्रम को सिर्फ औपचारिक न रखकर भावनात्मक और सांस्कृतिक उत्सव बना दिया।

हिंदी सिर्फ भाषा नहीं, पहचान है

मुख्य अतिथि श्री अनिल मुंडू (उप महाप्रबंधक, THDC) ने अपने संबोधन में कहा “हिंदी को अपनाना केवल कर्तव्य नहीं, बल्कि हमारी पहचान को सशक्त करना है।”

लेफ्टिनेंट कर्नल मधुर गुलेरिया ने इसे और स्पष्ट करते हुए कहा कि“हिंदी देश ही नहीं, विदेशों में भी भारत की सांस्कृतिक छवि को मजबूत करती है।”

तकनीक और हिंदी का संगम बना चर्चा का केंद्र

इस सम्मेलन की सबसे खास बात रही—हिंदी का आधुनिक और डिजिटल रूप

चर्चा केंद्र: जहां हिंदी के वास्तविक उपयोग पर हुई सबसे गहरी बात

सम्मेलन का सबसे महत्वपूर्ण और प्रभावशाली हिस्सा रहा चर्चा सत्र, जिसमें राजभाषा से जुड़े अधिकारियों और विशेषज्ञों ने जमीनी अनुभव साझा किए।

श्री पंकज कुमार शर्मा (उप प्रबंधक, राजभाषा, THDC) ने अपने विचार रखते हुए कहा कि

हिंदी का प्रयोग तभी प्रभावी होगा जब इसे “दबाव” नहीं बल्कि “कार्यसुविधा” के रूप में अपनाया जाएगा।

उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि कई कार्यालयों में हिंदी को केवल औपचारिकता के रूप में देखा जाता है,

जबकि इसकी वास्तविक क्षमता कार्य को सरल बनाने में है।

राजभाषा विभाग के श्री संतोष टेलकीकर ने चर्चा को आगे बढ़ाते हुए हिंदी के डिजिटल रूपांतरण पर प्रकाश डाला।

उन्होंने बताया कि आज के दौर में ई-ऑफिस, डिजिटल फाइलिंग और ऑनलाइन रिपोर्टिंग

में हिंदी के लिए विकसित हो रहे टूल्स ने भाषा के प्रयोग को पहले से कहीं अधिक सहज बना दिया है।

उनका स्पष्ट मत था कि अगर तकनीक के साथ हिंदी को जोड़ा जाए, तो यह प्रशासन की

मुख्य कार्यभाषा बन सकती है, न कि सिर्फ सहायक भाषा।

इसी क्रम में श्री योगेन्द्र प्रसाद (राजभाषा अधिकारी, THDC) ने व्यावहारिक पक्ष को सामने रखते हुए

तिमाही रिपोर्ट से जुड़े नए प्रपत्रों और प्रश्नावली को समझाया।

उन्होंने यह भी बताया कि सही तरीके से डेटा भरने और रिपोर्टिंग करने से न केवल राजभाषा कार्यान्वयन मजबूत होता है, बल्कि कार्यालयी पारदर्शिता और जवाबदेही भी बढ़ती है।

यानी साफ संदेश: हिंदी अब सिर्फ किताबों तक सीमित नहीं, बल्कि टेक्नोलॉजी के साथ कदम से कदम मिला रही है।

जब प्रशासन और शिक्षा एक मंच पर आए

सम्मेलन में प्रशासन, सेना और शिक्षा जगत के अधिकारी एक साथ नजर आए-

जो इस बात का संकेत है कि हिंदी को बढ़ावा देना अब सिर्फ एक विभाग का काम नहीं, बल्कि सामूहिक जिम्मेदारी बन चुका है।

सम्मान, संकल्प और सफल समापन

अंत में प्राचार्या श्रीमती कृति ने सभी अतिथियों का आभार व्यक्त करते हुए हिंदी के निरंतर प्रयोग का संकल्प लिया।

स्मृति चिह्न भेंट कर अतिथियों को सम्मानित किया गया और मध्याह्न भोजन के साथ सम्मेलन का समापन हुआ।

https://youtu.be/q5ArWD5NwFI?si=P59w5dEjEYIKtGP1
https://regionalreporter.in/cuet-exam-centres-garhwal-university-students-issue/
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