इंद्रेश मैखुरी
शांतिपूर्ण आंदोलन पर चली थीं गोलियां
उत्तराखंड राज्य की मांग को लेकर 1994 में आंदोलन तेज हो गया था।
इसी दौरान 1 सितंबर को खटीमा में आंदोलनकारियों और पुलिस के बीच टकराव हुआ।
पुलिस फायरिंग में कई आंदोलनकारी मारे गए और बड़ी संख्या में लोग घायल हुए।
खटीमा गोलीकांड उत्तराखंड राज्य आंदोलन के सबसे दर्दनाक अध्यायों में शामिल है।
इसके बाद आंदोलन के दौरान मसूरी और मुजफ्फरनगर सहित कई स्थानों पर भी हिंसक घटनाएं हुईं।
इन घटनाओं ने अलग राज्य की मांग को और व्यापक जनसमर्थन दिया।
सलीम अहमद समेत कई आंदोलनकारियों ने दी शहादत
खटीमा गोलीकांड में शहीद हुए आंदोलनकारियों में सलीम अहमद का नाम प्रमुखता से लिया जाता है।
उपलब्ध शहीद सूचियों में परमजीत सिंह, भगवान सिंह, प्रताप सिंह, धर्मानंद भट्ट, गोपी चंद्र और रामपाल सिंह समेत अन्य आंदोलनकारियों के नाम भी दर्ज हैं।
राज्य आंदोलन के इतिहास में यह तथ्य महत्वपूर्ण माना जाता है कि अलग उत्तराखंड की मांग में विभिन्न समुदायों और वर्गों के लोगों ने भागीदारी की थी।

खटीमा से शुरू हुआ दमन का दर्दनाक दौर
1 सितंबर 1994 की घटना के बाद आंदोलनकारियों पर पुलिस कार्रवाई का सिलसिला अन्य स्थानों तक पहुंचा।
2 सितंबर 1994 को मसूरी गोलीकांड हुआ, जबकि 2 अक्टूबर 1994 को मुजफ्फरनगर के रामपुर तिराहा कांड ने आंदोलन को झकझोर दिया।
इसके बाद भी राज्य आंदोलन से जुड़ी कई घटनाएं सामने आईं।
10 नवंबर 1995 को श्रीनगर गढ़वाल के श्री यंत्र टापू में हुई पुलिस कार्रवाई भी आंदोलन के इतिहास की प्रमुख घटनाओं में गिनी जाती है।
शहादत के बाद 9 नवंबर 2000 को बना उत्तराखंड
लंबे आंदोलन और अनेक आंदोलनकारियों की शहादत के बाद 9 नवंबर 2000 को उत्तराखंड देश का 27वां राज्य बना।
राज्य गठन के बाद भी आंदोलन के दौरान शहीद हुए लोगों की स्मृति उत्तराखंड की राजनीतिक और सामाजिक चेतना का महत्वपूर्ण हिस्सा बनी हुई है।
खटीमा गोलीकांड की बरसी पर हर साल आंदोलनकारियों और विभिन्न सामाजिक संगठनों की ओर से शहीदों को श्रद्धांजलि दी जाती है।
शहादत का संदेश आज भी प्रासंगिक
खटीमा गोलीकांड की बरसी केवल आंदोलनकारियों की शहादत को याद करने का अवसर नहीं है। यह उत्तराखंड आंदोलन के उन मूल मुद्दों पर विचार करने का भी अवसर है, जिनके लिए अलग राज्य की मांग उठी थी।
जल-जंगल-जमीन, रोजगार, पलायन और पहाड़ी क्षेत्रों के विकास जैसे सवाल आज भी उत्तराखंड की राजनीति और समाज के केंद्र में हैं।
1 सितंबर 1994 को खटीमा में शहीद हुए सभी राज्य आंदोलनकारियों को श्रद्धांजलि दी जा रही है।















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