उत्तराखंड में NEET UG काउंसलिंग के दौरान सामने आए फर्जी और संदिग्ध प्रमाणपत्रों के मामले ने अब बड़ा रूप ले लिया है।
स्वतंत्रता संग्राम सेनानी आश्रित कोटे से शुरू हुई जांच अब राज्य कोटे के तहत आरक्षण या विशेष श्रेणी का लाभ लेने वाले अभ्यर्थियों तक पहुंच गई है।
पहले संदिग्ध प्रमाणपत्रों के कुछ मामले सामने आए थे, लेकिन जांच बढ़ने के बाद सरकार ने दस्तावेजों की व्यापक पड़ताल के निर्देश दिए।
अब एमबीबीएस और बीडीएस में राज्य कोटे के तहत दाखिला लेने वाले 778 अभ्यर्थियों के मूल प्रमाणपत्रों का सत्यापन कराया जा रहा है।
इनमें 568 अभ्यर्थी आवंटित सीट पर प्रवेश ले चुके हैं, जबकि 210 अभ्यर्थियों ने फ्लोट विकल्प चुना है।
फ्लोट विकल्प का मतलब है कि सीट मिलने के बाद भी अभ्यर्थी अगले चरण में बेहतर सीट मिलने की संभावना बनाए रखता है।
क्यों जांचे जा रहे हैं 778 अभ्यर्थियों के प्रमाणपत्र
एचएनबी उत्तराखंड चिकित्सा शिक्षा विश्वविद्यालय की काउंसलिंग में पहले और दूसरे चरण से जुड़े कुल 1112 अभ्यर्थियों का विवरण सामने आया है।
इनमें राज्य कोटे के तहत आरक्षण या विशेष श्रेणी का लाभ लेने वाले 778 अभ्यर्थियों के
दस्तावेज सत्यापन के लिए संबंधित जिलों में भेजे जा रहे हैं।
जांच में केवल स्वतंत्रता संग्राम सेनानी आश्रित प्रमाणपत्र ही नहीं देखे जाएंगे।
स्थायी निवास, एससी, एसटी, ओबीसी, ईडब्ल्यूएस और अन्य आरक्षित श्रेणियों से जुड़े दस्तावेज भी रिकॉर्ड से मिलाए जाएंगे।
यानी अब किसी अभ्यर्थी को केवल NEET की मेरिट और काउंसलिंग में सीट मिलने से दाखिला पूरी तरह सुरक्षित नहीं माना जाएगा।
जिस प्रमाणपत्र के आधार पर आरक्षण या विशेष श्रेणी का लाभ मिला है, उसकी वैधता भी जांच का हिस्सा होगी।
वहीं, ऑल इंडिया मैनेजमेंट कोटे से दाखिला लेने वाले अभ्यर्थियों को इस राज्य स्तरीय आरक्षण सत्यापन के दायरे से अलग रखा गया है।
5 संदिग्ध प्रमाणपत्रों से शुरू हुई जांच
मामला सितंबर में तब सामने आया जब स्वतंत्रता संग्राम सेनानी आश्रित कोटे के तहत
एमबीबीएस में दाखिले के लिए जमा किए गए कुछ प्रमाणपत्रों पर सवाल उठे।
जिलाधिकारियों की जांच में पांच अभ्यर्थियों से जुड़े प्रमाणपत्र संदिग्ध पाए गए।
सत्यापन के बाद संबंधित प्रमाणपत्रों को फर्जी पाए जाने पर दाखिलों को निरस्त किया गया।
उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक चार छात्राओं के एमबीबीएस दाखिले रद्द किए गए और पांच लोगों के खिलाफ मामले दर्ज हुए।
जांच में सामने आया कि प्रमाणपत्रों में दिए गए पते और दावों का सत्यापन नहीं हो पा रहा था।
इसके बाद पुलिस ने यह पता लगाने के लिए मुकदमे दर्ज किए कि प्रमाणपत्र कैसे तैयार हुए
और इसके पीछे किसी संगठित नेटवर्क की भूमिका तो नहीं है।
धर्मवीर के नाम से जुड़े प्रमाणपत्रों ने बढ़ाया शक
एसआईटी की जांच में धर्मवीर नाम के स्वतंत्रता सेनानी से जुड़े प्रमाणपत्रों की भी पड़ताल हुई।
जांच के दौरान उनके परिजनों के बयान लिए गए और संबंधित राजस्व रिकॉर्ड खंगाले गए।
मीडिया रिपोर्टों में यह भी सामने आया कि अलग-अलग परिवारों से जुड़े अभ्यर्थियों के दस्तावेजों
में एक ही स्वतंत्रता सेनानी के विवरण का इस्तेमाल किए जाने का आरोप है।
एसआईटी इस पहलू की भी जांच कर रही है।
370 संदिग्ध अभ्यर्थियों की सूची से बढ़ा दायरा
मामले में नया मोड़ तब आया जब सामाजिक कार्यकर्ता प्रदीप बहुगुणा ने चिकित्सा शिक्षा मंत्री सुबोध उनियाल को करीब 370 अभ्यर्थियों की सूची सौंपी।
उन्होंने इन अभ्यर्थियों के स्थायी निवास और अन्य प्रमाणपत्रों की जांच की मांग की।
महत्वपूर्ण बात यह है कि सूची में शामिल सभी अभ्यर्थियों को फर्जी नहीं माना गया है।
उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक सूची में ऐसे मामले बताए गए हैं जिनके दस्तावेजों या पते को लेकर सत्यापन की जरूरत बताई गई थी।
इसके बाद चिकित्सा शिक्षा विभाग ने जांच का दायरा बढ़ाने का फैसला किया।
सरकार ने केवल स्वतंत्रता सेनानी आश्रित प्रमाणपत्रों के बजाय आरक्षित और विशेष श्रेणियों से जुड़े दस्तावेजों की जांच के निर्देश दिए।
सरकार ने सभी आरक्षित श्रेणियों की जांच के दिए निर्देश
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के निर्देश के बाद राज्य कोटे में आरक्षण का लाभ लेने वाले अभ्यर्थियों के प्रमाणपत्रों की दोबारा जांच शुरू हुई।
सरकार के मुताबिक अब तक जांच में आठ अभ्यर्थियों के प्रमाणपत्रों में गड़बड़ी मिलने के बाद
उनके प्रमाणपत्र और प्रवेश निरस्त किए जाने की जानकारी सामने आई है।
चिकित्सा शिक्षा मंत्री सुबोध उनियाल ने जिलास्तर पर जांच कर रिपोर्ट देने के निर्देश दिए हैं।
जांच में प्रमाणपत्र जारी करने के आधार और संबंधित सरकारी रिकॉर्ड भी देखे जा रहे हैं।
यानी जांच का सवाल केवल यह नहीं है कि किसी अभ्यर्थी ने गलत प्रमाणपत्र लगाया या नहीं।
यह भी देखा जा रहा है कि संदिग्ध प्रमाणपत्र जारी कैसे हुआ और सत्यापन की प्रक्रिया में कोई चूक हुई या नहीं।
तीसरे चरण की काउंसलिंग पर भी पड़ा असर
मामला सामने आने के बाद NEET UG काउंसलिंग के तीसरे चरण पर भी असर पड़ा।
रिपोर्टों के मुताबिक तीसरे चरण की प्रक्रिया को दस्तावेज सत्यापन से जोड़कर आगे बढ़ाने का फैसला किया गया।
पहले और दूसरे चरण में दाखिला लेने वाले उन अभ्यर्थियों के दस्तावेज दोबारा जांचे जा रहे हैं, जिन्होंने किसी श्रेणी या उपश्रेणी का लाभ लिया है।
इसका सीधा मतलब है कि मेडिकल सीटों के आवंटन के बाद भी दस्तावेजों की वैधता इस बार महत्वपूर्ण हो गई है।
अब जांच में आया 778 अभ्यर्थियों का रिकॉर्ड
अब तक की कार्रवाई को देखते हुए जांच का दायरा केवल कुछ स्वतंत्रता सेनानी आश्रित प्रमाणपत्रों तक सीमित नहीं रहा है।
राज्य कोटे के तहत आरक्षण या विशेष श्रेणी का लाभ लेने वाले 778 अभ्यर्थियों के दस्तावेजों का सत्यापन कराया जा रहा है।
इनमें 568 अभ्यर्थियों ने आवंटित सीट पर प्रवेश लिया है और 210 फ्लोट विकल्प में हैं।
जांच में उनके मूल प्रमाणपत्रों को संबंधित जिलों के सरकारी रिकॉर्ड से मिलाया जाएगा।
यदि किसी अभ्यर्थी का प्रमाणपत्र सही पाया जाता है तो दाखिले पर उसका असर नहीं होगा।
वहीं, जांच में प्रमाणपत्र फर्जी या पात्रता के विपरीत पाए जाने पर नियमानुसार कार्रवाई हो सकती है।
45 लाख रुपये में एमबीबीएस सीट का आरोप, दो गिरफ्तार
मामले की आपराधिक जांच में भी बड़ा अपडेट सामने आया है।
देहरादून पुलिस की एसआईटी ने 22 सितंबर को दो लोगों को गिरफ्तार किया।
गिरफ्तार आरोपियों की पहचान मेरठ निवासी रूपेश पंडित और हरिद्वार निवासी अरविंद कुमार के रूप में हुई है।
पुलिस के मुताबिक रूपेश एक एजुकेशन कंसल्टेंसी चलाता था।
पुलिस का दावा है कि तीन अभ्यर्थियों के एमबीबीएस दाखिले के लिए स्वतंत्रता संग्राम सेनानी आश्रित कोटे का इस्तेमाल कराने की बात सामने आई।
प्रत्येक सीट के लिए करीब 45 लाख रुपये की कथित डील और 20-20 लाख रुपये एडवांस लेने का आरोप है।
पुलिस के मुताबिक फर्जी दस्तावेज तैयार कराकर प्रमाणपत्र बनवाने और उसके आधार पर दाखिला दिलाने की कोशिश की गई।
मामले में अन्य लोगों की भूमिका की भी जांच जारी है।
एसआईटी अब नेटवर्क और दस्तावेजों की कड़ी जोड़ रही
18 सितंबर को देहरादून पुलिस ने मामले की जांच के लिए एसपी ग्रामीण जया बलोनी के नेतृत्व में एसआईटी गठित की थी।
टीम ने संबंधित मामलों के दस्तावेज कब्जे में लिए और मेडिकल संस्थानों से रिकॉर्ड जुटाए।
अब जांच में यह देखा जा रहा है कि फर्जी दस्तावेज तैयार कराने, प्रमाणपत्र बनवाने और मेडिकल दाखिले तक पहुंचाने में और कौन लोग शामिल थे।
इस पूरे मामले में फिलहाल दो स्तरों पर जांच चल रही है।
पहला, प्रशासनिक स्तर पर मेडिकल दाखिला लेने वाले अभ्यर्थियों के प्रमाणपत्रों का सत्यापन और दूसरा, पुलिस की एसआईटी द्वारा कथित फर्जीवाड़े के नेटवर्क की जांच।
यही वजह है कि 778 अभ्यर्थियों के दस्तावेजों की जांच को इस मामले का अगला बड़ा पड़ाव माना जा रहा है।
हालांकि, सत्यापन पूरा होने से पहले इन सभी अभ्यर्थियों को संदिग्ध या दोषी मानना सही नहीं होगा।


















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