रीजनल रिपोर्टर

सरोकारों से साक्षात्कार

अगस्तमुनि कांड: हाशिये पर धकेले जा रहे लोक-देवता?

महीपाल सिंह नेगी

उत्तराखंड के अगस्तमुनि में हाल ही में हुई घटना ने एक नई बहस को जन्म दे दिया है। यह बहस केवल एक विवाद या कानून-व्यवस्था की स्थिति तक सीमित नहीं है, बल्कि यह संघर्ष है ‘विशालकाय केंद्रीकृत आस्था’ और ‘पहाड़ की पारंपरिक लोक-आस्था’ के बीच की है।

स्थानीय लोगों का मानना है कि अगस्तमुनि की घटना महज एक इत्तेफाक नहीं, बल्कि एक ऐसी परिस्थिति थी, जिसका इंतजार शायद सत्ता के गलियारों में पहले से किया जा रहा था।

​विविधता पर प्रहार और ‘एक’ का एकाधिकार

​जानकारों का तर्क है कि वर्तमान सत्ता संरचना को ‘एक देश, एक विधान’ की तर्ज पर ‘एक ही देवता और एक ही आस्था’ का मॉडल पसंद है। पहाड़ के ‘भूमि भुम्याळ’ और लोक-देवताओं की स्वतंत्र सत्ता इस केंद्रीकृत ढांचे के लिए एक चुनौती की तरह देखी जा रही है।

जिस तरह राजनीति में क्षेत्रीय दलों और छोटे नेताओं को हाशिये पर धकेला जा रहा है, वैसा ही कुछ देव संस्कृति के साथ भी होता दिख रहा है।

​बनारस के कॉरिडोर निर्माण में दर्जनों छोटे मंदिरों का ध्वस्त होना और अयोध्या के बदलाव इसके उदाहरण के तौर पर पेश किए जा रहे हैं।

आरोप है कि ‘बड़े मंदिरों’ के भव्य प्रदर्शन के बीच उन छोटे थान और मंदिरों को कबाड़ समझा जा रहा है, जो सदियों से स्थानीय समुदाय की अटूट आस्था का केंद्र रहे हैं।

​देव-निशान और गेट का विवाद: आस्था या व्यवहार?

​अगस्तमुनि में द्वार (गेट) को लेकर उपजा विवाद तकनीकी से ज्यादा सांस्कृतिक है। पहाड़ की परंपरा में नंदा जात या चंडिका की देवरा यात्रा के ‘निशान’ 15 फीट तक ऊंचे होते हैं।

स्थानीय लोगों का तर्क है कि यात्रा मार्गों को अवरोध-मुक्त रखना केवल परंपरा नहीं, बल्कि एक व्यावहारिक जरूरत है ताकि देव-निशान और डोलियों को झुकना न पड़े। लेकिन, केंद्रीकृत विकास की सोच में इन सूक्ष्म स्थानीय बारीकियों के लिए कोई जगह नजर नहीं आती।

​आस्था का दोहरा मापदंड?

​मामले का सबसे चुभता हुआ पहलू कानूनी और सामाजिक दृष्टिकोण है। अयोध्या मामले में जिस ‘जन-आस्था’ को सर्वोच्च न्यायालय ने कानून से ऊपर मानकर सम्मान दिया, वही सम्मान अगस्तमुनि के ‘मुट्ठीभर’ लोगों की आस्था को मिलता नहीं दिख रहा है। क्या आस्था का पैमाना केवल ‘संख्या बल’ तय करेगा?

अगस्तमुनि की घटना ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या भव्यता की दौड़ में हम अपनी जड़ों और लोक-संस्कृति को खो देंगे? यदि ‘केंद्रीकृत आस्था’ की गुलामी ही भविष्य है, तो पहाड़ के स्वाभिमानी लोक-देवताओं का अस्तित्व और उनके भक्तों का विश्वास आज बड़े संकट में है।

https://regionalreporter.in/a-girl-from-uttarakhand-delivers-a-golden-performance-at-the-mangalore-half-marathon/
https://youtu.be/YPC1a3fTwIc?si=GPuhd0KiB7cUyYAS
Website |  + posts

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: