गौरा देवी को भारत रत्न देने की मांग तेज
1970 के दशक में महिलाओं ने पेड़ों से चिपककर रोकी थी कटाई, आज भी बरकरार है वही जज्बा
उत्तराखंड के चमोली जनपद स्थित रैणी गांव, जहां से विश्व प्रसिद्ध चिपको आंदोलन की शुरुआत हुई थी, आज भी पर्यावरण संरक्षण की मिसाल बना हुआ है।
सत्तर के दशक में जब देश में वन संरक्षण को लेकर सख्त कानून नहीं थे और जंगलों की अंधाधुंध कटाई हो रही थी,
तब इसी गांव की महिलाओं ने पेड़ों से चिपककर उन्हें बचाने का ऐतिहासिक कदम उठाया था।
यह आंदोलन बाद में देश ही नहीं, बल्कि दुनिया भर में पर्यावरण संरक्षण का प्रतीक बन गया।
गौरा देवी के नेतृत्व में हुआ ऐतिहासिक विरोध
रैणी गांव की महिला नेता गौरा देवी ने 1974 में इस आंदोलन की अगुवाई की।
जब ठेकेदारों के मजदूर पेड़ों की कटाई के लिए गांव पहुंचे, तब पुरुषों की अनुपस्थिति में
उन्होंने 27 महिलाओं के साथ मिलकर उनका विरोध किया।
महिलाओं ने पेड़ों से चिपककर कहा- “पहले हमें काटो, फिर पेड़” और इसी अहिंसक विरोध ने ठेकेदारों को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया।
रैणी गांव: आंदोलन की जन्मस्थली
नीती घाटी में स्थित रैणी गांव आज भी उस ऐतिहासिक घटना का गवाह है।
स्थानीय महिलाओं ऊखा देवी, जूठी देवी, तुलसी देवी और उमा देवी का कहना है कि जंगल उनके जीवन और आजीविका का आधार हैं।
उनके अनुसार, आने वाली पीढ़ियों के लिए वन संपदा को बचाना बेहद जरूरी है
और इसी सोच के साथ आज भी गांव के लोग जंगलों की रक्षा के लिए सजग हैं।
जब मजदूर पहुंचे पेड़ काटने, महिलाओं ने संभाली कमान
26 मार्च 1974 को ठेकेदारों के मजदूर करीब 2500 पेड़ों की कटाई के लिए रैणी गांव पहुंचे थे।
उस दिन गांव के पुरुष मुआवजे के सिलसिले में बाहर गए हुए थे।
मजदूरों ने जब पेड़ काटने शुरू किए, तो महिलाओं ने विरोध किया।
लेकिन जब उनकी बात अनसुनी कर दी गई, तो गौरा देवी के नेतृत्व में महिलाएं पेड़ों से चिपक गईं।
इस अहिंसक आंदोलन ने जल्द ही जनांदोलन का रूप ले लिया और अंततः ठेकेदारों को पीछे हटना पड़ा।
भारत रत्न की मांग
गौरा देवी के योगदान को देखते हुए अब उन्हें मरणोपरांत भारत रत्न देने की मांग उठने लगी है।
गौरा देवी पर्यावरण एवं सामाजिक विकास समिति के अध्यक्ष सोहन सिंह राणा और संरक्षक पुष्कर सिंह राणा का कहना है कि उनके संघर्ष को राष्ट्रीय स्तर पर सम्मान मिलना चाहिए।
साथ ही, रैणी गांव में बन रहा स्मारक भी बजट के अभाव में धूरा पड़ा है, जिसे जल्द पूरा करने की मांग की जा रही है।
वैश्विक स्तर पर बना पर्यावरण संरक्षण का प्रतीक
चिपको आंदोलन ने न केवल भारत में, बल्कि विश्व स्तर पर पर्यावरण संरक्षण की सोच को नई दिशा दी।
पेड़ों से चिपककर उन्हें बचाने का यह अनोखा तरीका आज भी कई आंदोलनों को प्रेरित करता है।
















Leave a Reply