डा. अतुल शर्मा | गांधी जयंती पर विशेष
खादी केवल एक वस्त्र नहीं, बल्कि विचार, स्वावलंबन और सादगी की पहचान रही है।
मेरे पिताजी और अम्मा जी ने वर्ष 1940 में चरखे पर सूत कातकर खादी पहनने का व्रत लिया था।
उस दौर में खादी पहनना केवल व्यक्तिगत पसंद नहीं, बल्कि एक विचार और संकल्प से जुड़ा हुआ था।
स्वाधीनता संग्राम सेनानी और राष्ट्रीय धारा के प्रमुख कवि श्रीराम शर्मा ‘प्रेम’ की कालजयी पंक्तियां हैं-
“खादी है एक विचार, न इसको केवल वस्त्र कहो।”
मेरी अम्मा जी महिला आश्रम की कार्यकारिणी में रहीं।
वहीं मेरे पिताजी देहरादून के खादी भंडार के प्रथम मैनेजर थे।
खादी का वह गरिमामय रूप, जो पिताजी और अम्मा जी के व्यक्तित्व पर अपना अलग प्रभामंडल बिखेरता था,
आज भी मेरी आंखों की स्मृतियों में ही नहीं, बल्कि मेरे संस्कारों में भी जीवित है।
खादी का कपड़ा हो या खादी सिल्क, दोनों में सादगी और गरिमा का अपना अलग आकर्षण रहा है।
महात्मा गांधी के आह्वान के बाद खादी को कुटीर उद्योग, स्वावलंबन और स्वदेशी भावना के
प्रतीक के रूप में अपनाने वालों में मेरे पिताजी और अम्मा जी भी शामिल रहे।
गांधीजी ने मेरे पिताजी को खादी के प्रचार-प्रसार का काम भी सौंपा था।
उस समय खादी केवल बाजार में बिकने वाली वस्तु नहीं थी, बल्कि लोग इसे भावना और विचार के साथ अपनाते थे।
पिताजी जहां जाते, वहां खादी की बिक्री बढ़ जाती थी। मेरठ के गांधी आश्रम में उस समय विचित्र नारायण शर्मा व्यवस्थापक थे।
खादी के साथ जुड़ी सादगी की विरासत
वह खरे लोगों का युग था। ऐसे लोग, जिनके लिए विचार और व्यवहार में कोई अंतर नहीं था।
समय बदला, परिस्थितियां बदलीं और जीवनशैली भी बदली, लेकिन कुछ लोगों ने आज भी सादगी की उस मशाल को थाम रखा है।
मेरे लिए खादी आज भी सिर्फ कपड़ा नहीं है। यह मेरे माता-पिता के जीवन, उनके विचारों और उस दौर की स्मृतियों से जुड़ी हुई विरासत है।
चरखे से निकला वह सूत केवल धागा नहीं था, बल्कि आत्मनिर्भरता, स्वदेशी और सादगी के विचार को आगे बढ़ाने का माध्यम था।















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