नंदा सप्तमी पर आज होगा विशेष पूजन
श्रीनगर गढ़वाल में स्थित मां नंदा मंदिर में नंदा सप्तमी के अवसर पर धार्मिक अनुष्ठानों का आयोजन किया जा रहा है।
मंदिर में मां नंदा और सुनंदा को दो बहनों के रूप में पूजा जाता है।
नंदा सप्तमी परंपरा के तहत आज मां सुनंदा को बांद (हल्दी हाथ) दिए गए और शाम को मां भगवती की डोली नगर भ्रमण पर निकलेगी।
इसके बाद कीर्तन-भजन, रात्रि जागरण, पूजा-अर्चना और हवन का आयोजन होगा।
मंदिर के पं. धीरेंद्र प्रसाद घिल्ड़ियाल के अनुसार, यहां मां नंदा की परंपरा काफी पुरानी है।
उन्होंने बताया कि पुजारिन प्रेमवती मैठाणी के साथ दहेज स्वरूप नौटी से उनके साथ आती हैं।
इसी मान्यता के बाद यहां मां भगवती की स्थापना हुई और नंदा की परंपरा आगे बढ़ी।

नंदा नवरात्रि में पंचगव्य से स्नान और हरियाली पूजन
पं. धीरेंद्र प्रसाद घिल्ड़ियाल ने बताया कि मंदिर में हर वर्ष नंदा नवरात्रि का आयोजन होता है।
इस बार 12 तारीख से मां भगवती को पंचगव्य आदि से स्नान कराया गया।
इसके बाद विधि-विधान से पूजा-अर्चना की गई और हरियाली बोई गई। उन्होंने मंदिर को सिद्धपीठ बताते हुए कहा कि श्रद्धालुओं की मां के प्रति गहरी आस्था है।
नंदा सप्तमी के दिन मां नंदा और सुनंदा दोनों बहनों की परंपरा के अनुसार पूजा की जा रही है।
आज मां सुनंदा को बांद दिया गया और शाम करीब चार बजे मां भगवती की डोली नगर भ्रमण के लिए निकलेगी।
शाम को कीर्तन-भजन और रात्रि जागरण होगा। ढोल-दमाऊं के साथ पूजा-अर्चना और हवन भी किया जाएगा।
इसके बाद सुबह मां सुनंदा को उनके ससुराल यानी कैलास के लिए विदा किया जाएगा।
इसके बाद अष्टमी के दिन फिर मां नंदा का स्वरूप तैयार कर उन्हें बांद दिया जाएगा।
इसके बाद यज्ञ-हवन और प्रसाद वितरण होगा। सुबह प्राण-प्रतिष्ठा समेत अन्य धार्मिक अनुष्ठान मंदिर की परंपरा के अनुसार किए जाएंगे।
मक्का से तैयार होते हैं नंदा-सुनंदा के स्वरूप
मंदिर की विशेष परंपरा में मां नंदा और सुनंदा के स्वरूप तैयार करने का भी अपना महत्व है।
पं. धीरेंद्र प्रसाद घिल्ड़ियाल के अनुसार, इसके लिए करीब दो-तीन महीने पहले मक्का बोया जाता है।
मक्का तैयार होने के बाद उसे काटकर मां भगवती के स्वरूप तैयार किए जाते हैं। उन्होंने बताया कि अलग-अलग स्थानों पर इस परंपरा में कुछ अंतर हो सकता है।
श्रीनगर गढ़वाल में सुहागिन महिलाएं और कन्याएं मिलकर मां के स्वरूप तैयार करती हैं। इसके बाद उनका श्रृंगार किया जाता है।
पंडित जी के अनुसार यहां मां नंदा और सुनंदा को दो बहनों के रूप में पूजा जाता है।
मां सुनंदा को कैलास के लिए विदा करने के बाद अगले दिन मां नंदा का स्वरूप तैयार किया जाता है।
पूजा-अनुष्ठान पूरा होने के बाद मां नंदा के स्वरूप को श्रद्धालुओं को प्रसाद के रूप में अलग-अलग स्वरूप में दिया जाता है।
इस पूरी परंपरा में स्थानीय श्रद्धालुओं और महिलाओं की भागीदारी रहती है।

प्रेमवती मैठाणी ने मंदिर सेवा को जीवन समर्पित किया
पं. धीरेंद्र प्रसाद घिल्ड़ियाल ने मंदिर की परंपरा में प्रेमवती मैठाणी के योगदान को भी याद किया। उन्होंने बताया कि प्रेमवती मैठाणी सरल और शील स्वभाव की महिला थीं।
कम उम्र में पति के निधन के बाद उन्होंने अपना जीवन मां भगवती की सेवा में समर्पित कर दिया।
मंदिर सेवा के साथ उन्होंने समाजसेवा में भी योगदान दिया।
जब प्रेमवती मैठाणी को लगा कि उनका शरीर अब कमजोर हो रहा है, तब उन्होंने जीवनकाल में ही मंदिर सेवा की जिम्मेदारी अपनी भतीजी सरोजिनी देवी को सौंप दी।
उनकी भतीजी सरोजिनी देवी ने भी लंबे समय करती आ रही है।
पं. धीरेंद्र प्रसाद घिल्ड़ियाल बताते हैं कि मां की सेवा करते हुए उनका यह सातवां वर्ष है।
उन्होंने कहा कि आज तक उन्होंने अपनी जेब से यहां कुछ नहीं लगाया और मां का सेवक बनकर सेवा कर रहे हैं।
उनकी कामना है कि मां भगवती सभी श्रद्धालुओं का कल्याण करें।
मंदिर के धार्मिक कार्य श्रद्धालुओं के सहयोग से
मंदिर के विकास और व्यवस्थाओं को लेकर पं. धीरेंद्र प्रसाद घिल्ड़ियाल ने बताया कि पिछले वर्ष से यहां एक समिति भी बनी है। यह समिति अपने स्तर पर मंदिर के लिए कुछ कार्य कर रही है।
उन्होंने बताया कि मंदिर में होने वाले धार्मिक कार्य श्रद्धालुओं और स्थानीय लोगों के सहयोग से ही संपन्न होते हैं।
मंदिर की धार्मिक परंपराओं को आगे बढ़ाने में स्थानीय सहयोग की महत्वपूर्ण भूमिका है।
2027 में निकलेगी नंदा राज जात के लिए छंतौली
पं. धीरेंद्र प्रसाद घिल्ड़ियाल ने बताया कि करीब 12 वर्ष पहले श्रीनगर गढ़वाल से भी छंतौली गई थी।
उन्होंने कहा कि वर्ष 2027 में दोबारा यहां से मां भगवती की यात्रा जाने की बात है। इसके लिए भव्य आयोजन की तैयारी किए जाने की बात उन्होंने कही।














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