डॉ. सुशील उपाध्याय
देश में यूजीसी के समता (इक्वलिटी) रेगुलेशन को लेकर मचे राजनीतिक और सामाजिक शोर के बीच नीट पीजी
2025 में कटऑफ जीरोऔर कुछ मामलों में माइनस परसेंटाइल तक गिराए जाने जैसा गंभीर मुद्दा हाशिए पर चला गया है।
यह फैसला मेडिकल शिक्षा की गुणवत्ता और योग्यता को लेकर नए सवाल खड़े कर रहा है।
जीरो परसेंटाइल पर भी पीजी मेडिकल में प्रवेश
नेशनल मेडिकल बोर्ड ने हजारों पीजी सीटें खाली रहने का हवाला देते हुए नीट पीजी की कटऑफ को शून्य तक घटा दिया।
इसके बाद ऐसे अभ्यर्थी भी मेडिकल की पीजी डिग्री के लिए पात्र हो गए, जो क्वालिफाइंग परीक्षा में शून्य या उससे कम अंक लाए थे।
सरकारी नहीं, प्राइवेट कॉलेजों को मिलेगा फायदा
विशेषज्ञों के अनुसार इस फैसले का लाभ सरकारी मेडिकल कॉलेजों में नहीं, बल्कि महंगे प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों को मिलेगा।
सरकारी कॉलेजों में अब भी ऊंची मेरिट पर ही प्रवेश संभव है, जबकि प्राइवेट कॉलेजों में मोटी फीस देने वाले अभ्यर्थियों के लिए रास्ता खुल गया है।
आर्थिक हैसियत बनी योग्यता का विकल्प
हकीकत यह है कि जीरो परसेंटाइल पर प्रवेश पाने वाले अधिकांश छात्र वही होंगे, जो पहले प्राइवेट कॉलेजों से एमबीबीएस कर चुके हैं
और जिनके परिवार 20–30 लाख रुपये सालाना फीस चुकाने में सक्षम हैं। इससे यह साफ होता है कि मेडिकल शिक्षा में योग्यता से ज्यादा आर्थिक क्षमता निर्णायक बनती जा रही है।
मेडिकल शिक्षा की गुणवत्ता पर उठे सवाल
चिंता इस बात की भी है कि कुछ मेडिकल संगठनों द्वारा इस निर्णय का समर्थन किया गया।
जानकारों का कहना है कि इससे मेडिकल पेशे की गुणवत्ता, नैतिकता और समाज के प्रति जिम्मेदारी पर नकारात्मक असर पड़ सकता है।
समाधान क्या हो सकता है?
विशेषज्ञों का सुझाव है कि प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों में फीस पर सख्त नियंत्रण हो और खाली सीटों पर सरकारी कोटा बढ़ाकर मेरिट वाले छात्रों को मौका दिया जाए।
इससे संसाधनों का बेहतर उपयोग होगा और योग्य डॉक्टर समाज को मिल सकेंगे।


















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