भारत के जनरल अनिल चौहान ने कहा कि राष्ट्रीय सुरक्षा केवल हथियारों और सीमाओं तक सीमित विषय नहीं है,
बल्कि यह देश की सामरिक संस्कृति, ऐतिहासिक चेतना और भविष्य की रणनीतिक सोच से गहराई से जुड़ी हुई है।
वे हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय में आयोजित एक विशेष कार्यक्रम में ‘राष्ट्रीय सुरक्षा और सामरिक संस्कृति’ विषय पर बोल रहे थे।
अपने संबोधन की शुरुआत में उन्होंने विश्वविद्यालय परिसर में आकर प्रसन्नता व्यक्त की और कहा कि शैक्षणिक संस्थान राष्ट्र की रणनीतिक सोच को दिशा देने में अहम भूमिका निभाते हैं।
जनरल चौहान ने कहा कि भारत की सामरिक सोच ऐतिहासिक रूप से अत्यंत समृद्ध रही है, लेकिन औपनिवेशिक काल और बाहरी आक्रमणों के दौरान इसमें बदलाव आया।
आज आवश्यकता है कि हम अपनी उस विरासत को पुनः पहचानें, जहाँ कूटनीति और शक्ति के संतुलन पर विशेष बल दिया गया था।
उन्होंने स्पष्ट किया कि सामरिक संस्कृति का अर्थ केवल युद्ध लड़ना नहीं, बल्कि युद्ध को टालने की क्षमता और राष्ट्रीय हितों की प्रभावी रक्षा करना भी है।
उत्तराखंड की सामरिक भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण
अपने संबोधन में CDS ने उत्तराखंड को भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए एक अत्यंत महत्वपूर्ण बॉर्डर स्टेट बताया।
उन्होंने कहा कि चीन और नेपाल से लगी सीमाएँ, राज्य की भौगोलिक स्थिति और समृद्ध सांस्कृतिक विरासत उत्तराखंड को विशिष्ट बनाती हैं।
उन्होंने उत्तराखंड के लोगों की वीरता और भारतीय सेना में राज्य के अद्वितीय योगदान की सराहना करते हुए कहा कि यहाँ के युवाओं में देश सेवा का जज़्बा स्वाभाविक रूप से मौजूद है।
भारत के सामने प्रमुख रणनीतिक चुनौतियाँ
जनरल अनिल चौहान ने भारत के सामने मौजूद प्रमुख सुरक्षा चुनौतियों की ओर भी ध्यान दिलाया। उन्होंने कहा कि
- भारत के अनसेटल्ड बॉर्डर्स एक बड़ी चुनौती हैं, जहाँ पड़ोसी देशों द्वारा अवैध दावे और अतिक्रमण किए गए हैं।
- दोनों प्रमुख पड़ोसी देश न्यूक्लियर सक्षम हैं, जिससे ऊपरी स्तर पर सामरिक स्थिरता तो आती है, लेकिन निचले स्तर पर अस्थिरता बढ़ती है।
- इसी अस्थिरता से प्रॉक्सी वॉर, आतंकवाद और ग्रे ज़ोन वॉरफेयर जैसी चुनौतियाँ जन्म लेती हैं।
- उन्होंने कहा कि लंबे और विनाशकारी युद्ध भारत के विकास लक्ष्यों के विपरीत होंगे।
- 2047 तक विकसित भारत के लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए देश को छोटे, स्मार्ट और इंटेलिजेंट युद्ध की तैयारी करनी होगी, जिसके लिए ओरिजिनल थिंकिंग और स्मार्ट टैक्टिक्स का विकास जरूरी है।

युवाओं और विश्वविद्यालयों की भूमिका
CDS ने कहा कि गढ़वाल विश्वविद्यालय जैसे शिक्षण संस्थानों को राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े शोध और अध्ययन में अग्रणी भूमिका निभानी चाहिए।
उन्होंने युवाओं से आह्वान किया कि वे स्वयं को शारीरिक के साथ-साथ मानसिक और बौद्धिक रूप से भी सशक्त बनाएं, ताकि बदलते वैश्विक परिदृश्य को समझकर राष्ट्र की सुरक्षा में योगदान दे सकें।
अपने संबोधन के अंत में उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि उत्तराखंड अपनी सामरिक संस्कृति, भौगोलिक स्थिति और युवा शक्ति के बल पर विकसित भारत 2047 के लक्ष्य में एक मजबूत स्तंभ सिद्ध होगा।
















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