उत्तराखण्ड भाषा संस्थान, देहरादून द्वारा ‘उत्तराखण्ड साहित्य गौरव सम्मान’ के अंतर्गत चर्चित कवि-कथाकार डॉ.
अनिल कार्की को वर्ष 2025 का प्रतिष्ठित ‘चन्द्रकुंवर बर्त्वाल पुरस्कार’ प्रदान करने का निर्णय लिया गया है।
यह सम्मान साहित्य सृजन, सेवा और उत्कृष्ट योगदान के लिए दिया जाता है, जिसमें 50 हजार रुपये की धनराशि,
सम्मान-चिह्न, प्रशस्ति-पत्र और अंगवस्त्र शामिल हैं।
30 मार्च को होगा सम्मान समारोह
संस्थान की निदेशक मायावती ढकरियाल ने पत्र के माध्यम से डॉ. कार्की को इस सम्मान की सूचना दी।
उन्होंने बताया कि अलंकरण समारोह 30 मार्च 2026 को देहरादून स्थित मुख्य सेवक सदन (मुख्यमंत्री कार्यालय) में आयोजित किया जाएगा।
पिथौरागढ़ के पीपलतड़ गांव से रखते हैं संबंध
पिथौरागढ़ जिले के पीपलतड़ गांव में जन्मे डॉ. अनिल कार्की वर्तमान में उत्तराखण्ड मुक्त विश्वविद्यालय, हल्द्वानी में
हिन्दी विभाग में सहायक प्राध्यापक के पद पर कार्यरत हैं। हिन्दी लेखन में कुमाऊँनी शब्दावली के प्रभावी प्रयोग
के लिए वे विशेष रूप से जाने जाते हैं, जिसने हिन्दी साहित्य को पहाड़ी लोक-जीवन की गहराई से जोड़ा है।
एक दर्जन से अधिक किताबें प्रकाशित
डॉ. कार्की की एक दर्जन से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। उनकी प्रमुख कृतियों में ‘उदास बखतों का
रमोलिया’, ‘पलायन से पहले’, ‘नदी भेड़ नहीं होती’, ‘सुन सुवा बणखण्डी’ (कविता संग्रह) तथा ‘भ्यास कथा तथा
अन्य कहानियाँ’, ‘धार का गिदार’ (कहानी संग्रह) शामिल हैं। इसके अलावा ‘अपनी माटी अपना बचपन’ और
‘महासीर के मुलुक से’ जैसे संस्मरण भी चर्चित रहे हैं। उन्होंने ‘एक तारो दूर चलक्यो’, ‘लोक पहरुवे’ और ‘हाशिए
का हिमाल’ का संपादन भी किया है।
साहित्य में लोक संस्कृति और यथार्थ का संगम
उनका साहित्य विद्रोह, संघर्ष, संवेदनाओं और यथार्थ का सशक्त चित्रण करता है। विशेष रूप से आम जनजीवन,
प्रवासन, लोक संस्कृति के क्षरण और पर्यावरणीय चुनौतियों को उन्होंने अपनी रचनाओं में प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया है।
साहित्य जगत में खुशी की लहर
इस सम्मान की घोषणा पर साहित्यकारों, शिक्षाविदों और सामाजिक क्षेत्र से जुड़े कई लोगों ने डॉ. कार्की को बधाई देते हुए उनके उज्ज्वल भविष्य की कामना की है।
















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