जब आस्था व्यापार बन जाए और भक्ति पर ‘कॉर्पोरेट मैनेजमेंट’ हावी होने लगे, तो आम श्रद्धालु का विश्वास डगमगाने लगता है।
श्रीनगर की प्रसिद्ध सिद्धपीठ में इन दिनों कुछ ऐसा ही नजारा देखने को मिल रहा है, जहां नियम केवल आम भक्तों के लिए हैं और रसूखदारों के लिए ‘कैमरा’ और ‘वीआईपी एंट्री’ का रेड कार्पेट बिछा है।
समय की मनमानी: जब 6:00 का मतलब 6:30 हो गया
हैरानी की बात है कि जिस मंदिर का प्रबंधन अटल विधान का दावा करता है, वहां सुबह 6:20 पर भी सन्नाटा पसरा रहता है।
गुजरात और हिमाचल से आए बुजुर्ग श्रद्धालु द्वार पर इंतजार करते रहे, लेकिन प्रबंधन अपनी सुविधानुसार तैयारी में जुटा था।
सवाल यह है कि क्या सार्वजनिक ट्रस्ट द्वारा संचालित संस्थानों में आरती और दर्शन का समय प्रबंधन की व्यक्तिगत सुविधा पर निर्भर करेगा?
यह श्रद्धालुओं के ‘पूजा करने के अधिकार’ के साथ एक भद्दा मजाक है।
नियमों की धज्जियां: ‘चोला’ चढ़ाया तो कैमरा भी जायज!
नगर निगम श्रीनगर की महापौर और मंदिर समिति ने सार्वजनिक किया था कि ‘मंदिर परिसर में मोबाइल फोन पूर्णतः वर्जित रहेगा’, लेकिन हकीकत इसके उलट है।
आरती के बीच रसूखदार लोग धड़ल्ले से मूर्तियों और गर्भ-गृह की तस्वीरें ले रहे थे।
तर्क दिया गया कि- “इन्होंने माता की ड्रेस चढ़ाई है, वह अपनी बेटी को फोटो भेज रहे हैं।”
सवाल: क्या कुछ रुपये का चोला चढ़ाने वालों को नियमों को तोड़ने का ‘लाइसेंस’ मिल जाता है? क्या श्रद्धा अब ‘वस्तु-विनिमय’ बन चुकी है?
जब तर्क खत्म हुए, तो ‘जाति’ पर उतरा प्रबंधन
इस पूरी घटना का सबसे शर्मनाक पहलू तब आया जब मंदिर प्रबंधन के पास तर्कों की कमी हो गई।
अपनी गलती मानने के बजाय, जागरूक श्रद्धालु से उसकी ‘जाति’ पूछी गई।
यह पूछने का मकसद शायद यह आंकना था कि सामने वाले की आवाज को दबाया जा सकता है या नहीं।
बड़ा सवाल: जब श्रीनगर नगर निगम और प्रशासन व्यवस्था सुधारने के दावे कर रहे हैं,
तो धरातल पर समिति के सदस्य अपनी मनमानी क्यों कर रहे हैं?
क्या नियम केवल कागजों और आम भक्तों के लिए हैं? यह सिद्धपीठ करोड़ों लोगों की आस्था का केंद्र है, इसे ‘वीआईपी रसूख’ का अड्डा न बनने दें।
















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