रीजनल रिपोर्टर

सरोकारों से साक्षात्कार

पुण्यतिथि विशेष: ‘बेडू पाको’ से दुनिया में गूंजा उत्तराखंड

चारु तिवारी

कौन कहता है मोहन उप्रेती मर गए हैं! आज भी लाखों कंठों में जीवित हैं ‘बेडू पाको ब्वाय’

6 जून, 1997… यह वह दिन था जब उत्तराखंड की लोक संस्कृति का एक युग मानो थम गया।

लेकिन सच यह है कि लोक के महान चितेरे, संगीतकार, रंगकर्मी और सांस्कृतिक पुरोधा मोहन उप्रेती कभी नहीं गए।

वे आज भी हर उस कंठ में जीवित हैं जो “बेडू पाको बारामासा” गुनगुनाता है।

प्रख्यात साहित्यकार ब्रजेन्द्र लाल शाह अपने संस्मरण ‘अब केवल बिंबों में’ में एक बेहद दिलचस्प घटना का जिक्र करते हैं।

अल्मोड़ा में उद्दा सिंह की दुकान पर एक दिन मोहन उप्रेती अचानक उन्हें रोकते हैं और एक नई धुन पर बार-बार गुनगुनाते हैं

“बेडू पाको बारामासा, हो नरैण काफल पाको चैता मेरी छैला…”

मोहन उप्रेती के पास गीत की पूरी पंक्तियां नहीं थीं।

उन्होंने ब्रजेन्द्र लाल शाह से कहा—”इसके आगे कुछ लिख।” फिर वहीं एक सिगरेट के खाली डिब्बे पर गीत के अगले बोल लिखे गए।

किसी ने नहीं सोचा था कि यह गीत एक दिन उत्तराखंड की पहचान बन जाएगा।

जब ‘बेडू पाको’ बना उत्तराखंड की सांस्कृतिक पहचान

उद्दा सिंह की छोटी सी दुकान से निकला यह गीत धीरे-धीरे गांवों, कस्बों और शहरों से होता हुआ देश-दुनिया तक पहुंच गया।

आज दुनिया के किसी भी कोने में जब “बेडू पाको बारामासा” बजता है तो उत्तराखंड का पहाड़, उसकी संस्कृति और उसकी आत्मा सामने खड़ी दिखाई देती है।

यही कारण है कि मोहन उप्रेती को केवल एक लोकगायक नहीं, बल्कि उत्तराखंड की सांस्कृतिक चेतना का प्रतिनिधि माना जाता है।

उनके गीतों में समाज का दर्द, संघर्ष, प्रतिरोध, लोकजीवन और बेहतर समाज का सपना एक साथ दिखाई देता है।

“मोहन गाता जाएगा…”

प्रसिद्ध साहित्यकार विद्यासागर नौटियाल ने अपनी चर्चित पुस्तक “मोहन गाता जायेगा” में उन्हें याद करते हुए लिखा है कि

जेल की कठोर परिस्थितियों में भी मोहन उप्रेती का संगीत जीवन का सहारा बन जाता था।

1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान वामपंथी विचारधारा से जुड़े होने के कारण

मोहन उप्रेती को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया था।

नौटियाल लिखते हैं कि जेल की बैरक में सुबह-सुबह जब मोहन उप्रेती भैरवी गाते थे तो उनकी आवाज पूरे कारागार में गूंज उठती थी।

उनके लिए संगीत केवल कला नहीं, बल्कि जीवन और संघर्ष का माध्यम था।

अल्मोड़ा से दुनिया तक का सफर

17 फरवरी 1928 को अल्मोड़ा के रानीधारा में जन्मे मोहन उप्रेती ने इतिहास विषय में स्नातकोत्तर शिक्षा प्राप्त की।

कुछ समय तक उन्होंने अल्मोड़ा इंटर कॉलेज में अध्यापन भी किया, लेकिन उनका मन लोक संस्कृति और रंगमंच में रमता था।

1951 में उन्होंने अपने सहयोगियों ब्रजेन्द्र लाल शाह, बांके लाल शाह, सुरेन्द्र मेहता,

तारा दत्त सती, लेनिन पंत और गोवर्धन तिवाड़ी के साथ मिलकर ‘लोक कलाकार संघ’ की स्थापना की।

इसके बाद उन्होंने कुमाऊं और गढ़वाल के गांव-गांव में जाकर लोकगीतों, लोकगाथाओं और लोककलाओं का संग्रह और संरक्षण किया।

डेढ़ हजार कलाकारों को दिया मंच

मोहन उप्रेती ने अपने जीवनकाल में लगभग 1500 लोक कलाकारों को प्रशिक्षित किया

और करीब 1200 सांस्कृतिक कार्यक्रमों का मंचन किया।

उन्होंने राजुला-मालूशाही, जीतू बगड़वाल, रामी बौराणी, रसिक रमौल, अजुवा बफौल

जैसी लोकगाथाओं को मंच पर नई पहचान दी।

साथ ही कुमाऊंनी और गढ़वाली भाषाओं में रामलीला का मंचन कर लोक रंगमंच को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया।

राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय से लेकर अंतरराष्ट्रीय मंचों तक

दिल्ली में उन्होंने पर्वतीय कला केन्द्र की स्थापना की और बाद में राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (NSD) में प्रवक्ता तथा एसोसिएट प्रोफेसर के रूप में भी कार्य किया।

अपने सांस्कृतिक जीवन में उन्होंने लगभग 22 देशों की यात्राएं कीं और उत्तराखंड की लोक संस्कृति को अंतरराष्ट्रीय मंचों तक पहुंचाया।

अल्जीरिया, जॉर्डन, सीरिया, रोम, चीन, थाईलैंड और उत्तर कोरिया जैसे देशों में उन्होंने सांस्कृतिक प्रस्तुतियां दीं।

पुरस्कार और सम्मान

लोक संस्कृति, संगीत और रंगमंच में उल्लेखनीय योगदान के लिए उन्हें अनेक राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सम्मान प्राप्त हुए।

  • साहित्य कला परिषद, दिल्ली सम्मान (1962)
  • भारतीय नाट्य संघ सम्मान (1981)
  • संगीत नाटक अकादमी सम्मान (1985)
  • सुमित्रानंदन पंत पुरस्कार
  • जॉर्डन का गोल्डन बियर पुरस्कार

वे इप्टा (IPTA) से भी जुड़े रहे और सलिल चौधरी, बलराज साहनी और उमर शेख जैसे दिग्गजों के साथ काम किया।

नेहरू ने दिया था ‘बेडू पाको ब्वाय’ नाम

कहा जाता है कि जब देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने उनके कंठ से “बेडू पाको बारामासा”

सुना तो वे इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने मोहन उप्रेती को प्यार से ‘बेडू पाको ब्वाय’ कहकर संबोधित किया।

मोहन उप्रेती अमर हैं…

विद्यासागर नौटियाल ने लिखा था—

“कौन कहता है मोहन उप्रेती मर गया है? मोहन जिंदा है। मेरे घर के बाहर सड़क पर गीत गाता जा रहा है। लोग झूम रहे हैं और वह गाता जा रहा है।”

आज उनकी पुण्यतिथि पर यह बात पहले से कहीं अधिक सच प्रतीत होती है।

जब तक उत्तराखंड की लोक संस्कृति जीवित है, जब तक पहाड़ों में “बेडू पाको बारामासा” गूंजता रहेगा, तब तक मोहन उप्रेती भी जीवित रहेंगे।

उत्तराखंड अपनी इस महान सांस्कृतिक विभूति को कृतज्ञतापूर्वक नमन करता है।

https://regionalreporter.in/dhami-government-third-liability-holders-list-six-leaders-appointed-uttarakhand/
https://youtu.be/9Uh5mRbFCJk?si=nTqsC3jqPFOSO4Nr
Website |  + posts

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *