केतन लाल हत्याकांड के बाद पहली बार रीजनल रिपोर्टर से बातचीत में उनकी दोनों बहनें मनीषा और शिवानी अपने आंसू
नहीं रोक सकीं। भाई को खोने का दर्द बयां करते हुए दोनों बहनों ने कहा कि अब उनका परिवार सिर्फ न्याय की लड़ाई ही नहीं
लड़ रहा, बल्कि समाज के बीच सम्मान के साथ जीने के लिए भी संघर्ष कर रहा है। उन्होंने सरकार और पुलिस प्रशासन से
हत्यारों को कड़ी से कड़ी सजा देने की मांग करते हुए परिवार से मिलने आने वाले लोगों को न रोकने की अपील की।
“अब बाजार जाने से भी डर लगता है”
बड़ी बहन मनीषा ने बताया कि भाई की हत्या के बाद उनका सामान्य जीवन पूरी तरह बदल गया है।
उन्होंने कहा, “हमारे लिए अब जीवन-यापन करना बहुत मुश्किल हो गया है। जब मैं बाजार जाती हूं तो कोई भी अपनी गाड़ी में
बैठाने को तैयार नहीं होता। खेतों में जाते हैं तो लोग गालियां देते हैं। हमें मानसिक रूप से प्रताड़ित किया जा रहा है।
हर कदम पर दबाव बनाया जा रहा है।”
“केतन मुझे सबसे ज्यादा मानते थे” कहकर रो पड़ी शिवानी
छोटी बहन शिवानी ने भाई के साथ बिताए पलों को याद करते हुए कहा, “केतन हम सभी बहनों से बहुत प्यार करते थे,
लेकिन मुझे सबसे ज्यादा मानते थे। उनके साथ बिताया हर पल आज भी आंखों के सामने है। अब यकीन ही नहीं होता कि वह
हमारे बीच नहीं हैं।” यह कहते-कहते शिवानी भावुक होकर रो पड़ीं।
“हत्यारों को मिले कड़ी से कड़ी सजा”
दोनों बहनों ने एक स्वर में कहा कि उनके भाई के हत्यारों को ऐसी सजा मिले, जो समाज के लिए मिसाल बने।
उनका कहना था कि परिवार को सिर्फ न्याय चाहिए और दोषियों को कड़ी से कड़ी सजा मिलनी चाहिए।
“जो हमें हिम्मत देने आ रहे हैं, उन्हें मत रोकिए”
बातचीत के दौरान मनीषा ने पुलिस प्रशासन पर परिवार से मिलने आने वाले लोगों को रोकने का भी आरोप लगाया।
उन्होंने कहा, “हमारी अपील है कि जो भी लोग हमसे मिलने आना चाहते हैं, उन्हें रोका न जाए। बाहर के लोगों ने उस समय
हमारा साथ दिया, जब हमारे अपने भी हमारे साथ नहीं खड़े थे। वे हमसे मिलने आते हैं तो हमें हिम्मत मिलती है, हमारा मनोबल
बढ़ता है और हमें लगता है कि हम इस लड़ाई में अकेले नहीं हैं।”
चंद्रशेखर आजाद को रोके जाने पर भी जताई नाराजगी
मनीषा ने बताया कि अब तक यशपाल आर्य, प्रदीप टम्टा, स्थानीय विधायक समेत कई जनप्रतिनिधि और अन्य लोग परिवार से
मिलने पहुंचे। लेकिन हाल ही में चंद्रशेखर आजाद को परिवार से मिलने से रोक दिया गया। इस पर उन्होंने कहा, “जो लोग
हमारा दुख बांटने आ रहे हैं, उन्हें हमसे मिलने से नहीं रोका जाना चाहिए। स्थानीय स्तर पर हमें लगातार दबाव झेलना पड़ रहा
है, खेतों और बाजार तक जाने में परेशानियां हो रही हैं। ऐसे समय में बाहर से आने वाले लोगों का साथ हमें मानसिक ताकत देता है।”
















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