हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल केंद्रीय विश्वविद्यालय के मालवीय मिशन शिक्षक प्रशिक्षण केंद्र (MMTTC) में
आयोजित पुनश्चर्या पाठ्यक्रम ‘भारतीय भाषाओं की समरसता एवं बहुलता का स्वरूप’ के नौवें दिन
भारतीय भाषाओं के भविष्य, बहुभाषिकता, नई तकनीक और भाषाई समरसता जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर चार अकादमिक सत्र आयोजित किए गए।
देशभर के विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों से जुड़े शिक्षकों ने इसमें सहभागिता की।
बहुभाषिकता भारत की सबसे बड़ी ताकत: डॉ. सुशील उपाध्याय
कार्यक्रम का संचालन करते हुए समन्वयक प्रो. गुड्डी बिष्ट पंवार ने कुलपति प्रो. श्रीप्रकाश सिंह के मार्गदर्शन के लिए आभार व्यक्त किया और सभी वक्ताओं व प्रतिभागियों का स्वागत किया।
पहले और दूसरे सत्र के मुख्य वक्ता चमनलाल महाविद्यालय, हरिद्वार के प्राचार्य डॉ. सुशील उपाध्याय रहे।
उन्होंने ‘भारतीय भाषाएँ, बहुभाषिकता और भविष्य की संभावनाएँ एवं चुनौतियाँ’ तथा
‘भारतीय भाषाओं की समरसता और एकत्व की वृद्धि में नई टेक्नोलॉजी का प्रयोग’ विषयों पर व्याख्यान दिया।
उन्होंने कहा कि भारत की बहुभाषिक परंपरा उसकी सांस्कृतिक और बौद्धिक शक्ति का आधार है।
नई शिक्षा नीति भारतीय भाषाओं के विकास के लिए नए अवसर प्रदान कर रही है।
साथ ही कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), मशीन अनुवाद, डिजिटल अभिलेखन और भाषा कॉर्पस जैसी आधुनिक तकनीकें भारतीय भाषाओं के संरक्षण और संवर्धन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।
भाषाई विविधता हमारी राष्ट्रीय शक्ति
तीसरे सत्र में उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. नवीन चंद्र लोहनी ने ‘आठवीं अनुसूची की भाषाओं और लिपियों में समरसता और मित्र भाव’ विषय पर व्याख्यान दिया।
उन्होंने कहा कि संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल भाषाएँ भारत की सांस्कृतिक विविधता का प्रतीक हैं
और इनके बीच परस्पर सम्मान एवं सहयोग राष्ट्रीय एकता को मजबूत करता है।
भारतीय भाषाओं के संरक्षण पर जोर
चौथे सत्र में काशी हिंदू विश्वविद्यालय की वरिष्ठ प्रोफेसर प्रो. श्रद्धा सिंह ने भारतीय भाषाओं की साझा सांस्कृतिक चेतना
और ज्ञान परंपरा पर प्रकाश डालते हुए कहा कि भाषाओं का संरक्षण और उनके बीच समन्वय आत्मनिर्भर भारत के निर्माण के लिए आवश्यक है।
कार्यक्रम के अंत में आयोजित संवाद सत्र में प्रतिभागियों ने विशेषज्ञों से विभिन्न विषयों पर चर्चा की और अपनी जिज्ञासाओं का समाधान प्राप्त किया।
विशेषज्ञों ने कहा कि भारतीय भाषाओं का भविष्य उनकी समृद्ध परंपरा और आधुनिक तकनीक के संतुलित समन्वय में निहित है।
एचएनबी गढ़वाल विश्वविद्यालय में भारतीय भाषाओं के भविष्य और नई तकनीक पर मंथन















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