हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय के भौतिकी विभाग स्थित हिमालयी वातावरणीय
एवं अंतरिक्ष भौतिकी शोध प्रयोगशाला (HASPRL) ने गढ़वाल घाटी की वायु गुणवत्ता को लेकर अहम वैज्ञानिक आंकड़े जारी किए हैं।
ओजोन परत संरक्षण के अंतरराष्ट्रीय दिवस की पूर्व संध्या पर 15 सितंबर को प्रयोगशाला ने अपना पांचवां ग्रीनहाउस गैस एवं वायु गुणवत्ता बुलेटिन जारी किया।
डॉ. आलोक सागर गौतम और उनकी शोध टीम ने 15 सितंबर 2025 से 15 सितंबर 2026 तक दर्ज वायु गुणवत्ता के आंकड़ों का वैज्ञानिक विश्लेषण किया।
अध्ययन में PM2.5, PM10, ओजोन और अन्य गैसीय प्रदूषकों के साथ मौसमीय परिस्थितियों का भी विश्लेषण किया गया है।
PM2.5 और PM10 का औसत स्तर चिंताजनक
वैज्ञानिक अध्ययन के मुताबिक एक साल की अवधि में गढ़वाल घाटी में PM2.5 की औसत सांद्रता 73.30 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर रही।
वहीं PM10 का औसत स्तर 100.48 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर दर्ज किया गया।
अध्ययन के अनुसार PM2.5 की सांद्रता 169 दिनों में और PM10 की सांद्रता 146 दिनों में CPCB की 24 घंटे की निर्धारित सीमा से अधिक रही।
वैज्ञानिकों ने इन आंकड़ों को पर्वतीय क्षेत्र में लगातार वायु गुणवत्ता निगरानी और प्रदूषण नियंत्रण उपायों की जरूरत से जोड़ा है।
26 दिनों में ओजोन का स्तर मानक से ऊपर
गढ़वाल घाटी में ओजोन को लेकर भी अध्ययन में महत्वपूर्ण तथ्य सामने आए हैं।
339 वैध दिनों के आंकड़ों के विश्लेषण में 26 दिनों यानी 7.7 प्रतिशत दिनों में ओजोन का 8 घंटे का औसत CPCB की 100 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर सीमा से अधिक रहा।
हालांकि वैज्ञानिकों के अनुसार पूरे साल ओजोन का स्तर लगातार अधिक नहीं रहा।
कुछ खास दिनों में इसकी सांद्रता में अचानक और बेहद तेज बढ़ोतरी दर्ज की गई।
19 दिसंबर 2025 को ओजोन ने बनाया असामान्य रिकॉर्ड
रिपोर्ट के मुताबिक 19 दिसंबर 2025 को ओजोन की सबसे महत्वपूर्ण घटनाओं में से एक दर्ज हुई।
इस दिन ओजोन का 8 घंटे का औसत 634.13 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर तक पहुंच गया।
वहीं प्रति घंटे की ओजोन सांद्रता 880 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर से अधिक दर्ज हुई।
वैज्ञानिक विश्लेषण में इस घटना का संभावित संबंध स्थानीय बायोमास जलने से निकलने वाले प्रदूषकों
और घाटी में प्रदूषकों के फंसने वाली मौसमीय परिस्थितियों से बताया गया है।
वैज्ञानिकों के मुताबिक ऐसे मामलों को समझने के लिए पर्वतीय क्षेत्रों में लगातार निगरानी जरूरी है।
सर्दियों में प्रदूषण बढ़ने की प्रमुख वजह
अध्ययन में मौसम के अनुसार प्रदूषण के अलग-अलग पैटर्न सामने आए हैं।
सर्दियों में तापमान प्रतिलोमन और वातावरण की स्थिरता के कारण प्रदूषक घाटी में फंस सकते हैं। इससे PM का स्तर बढ़ता है।
गर्मियों में धूल, अधिक तापमान और तेज सौर विकिरण के कारण प्रकाश-रासायनिक प्रक्रियाएं तेज होती हैं।
इससे ओजोन और CO के स्तर में बढ़ोतरी हो सकती है।
मानसून में बारिश के कारण प्रदूषक वातावरण से हटते हैं। इसे वेट स्कैवेंजिंग कहा जाता है। इस दौरान PM की सांद्रता अपेक्षाकृत कम रही।
ओजोन की दोहरी भूमिका, ऊपर सुरक्षा कवच तो नीचे प्रदूषक
डॉ. आलोक सागर गौतम ने ओजोन की दोहरी भूमिका को समझाते हुए कहा कि ओजोन इस बात पर
निर्भर करता है कि वह वायुमंडल की किस ऊंचाई पर मौजूद है।
धरातल के पास मौजूद ओजोन वायु प्रदूषक है, जबकि समतापमंडल में यही ओजोन पृथ्वी के लिए प्राकृतिक सुरक्षा कवच का काम करता है।
ग्राउंड लेवल ओजोन सीधे किसी स्रोत से उत्सर्जित नहीं होता।
यह सूर्य के प्रकाश में नाइट्रोजन ऑक्साइड और वाष्पशील कार्बनिक यौगिकों के बीच होने वाली रासायनिक प्रक्रियाओं से बनता है।
इसकी अधिक सांद्रता आंखों और गले में जलन के साथ श्वसन तंत्र पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकती है।
समतापमंडल में ओजोन पृथ्वी का सुरक्षा कवच
पृथ्वी की सतह से करीब 10 से 50 किलोमीटर की ऊंचाई पर मौजूद ओजोन परत सूर्य की हानिकारक पराबैंगनी किरणों का बड़ा हिस्सा अवशोषित करती है।
खास तौर पर UV-B विकिरण से सुरक्षा मानव स्वास्थ्य के लिए महत्वपूर्ण है।
अत्यधिक UV विकिरण से त्वचा और आंखों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
इसी वजह से वैज्ञानिकों ने ओजोन परत के संरक्षण को पर्यावरण के साथ मानव स्वास्थ्य और आने वाली पीढ़ियों की सुरक्षा से भी जोड़ा है।
मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल और किगाली संशोधन का महत्व
वैज्ञानिकों ने बताया कि मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल ओजोन परत की सुरक्षा के लिए अंतरराष्ट्रीय प्रयासों की महत्वपूर्ण उपलब्धि है।
इसके तहत CFCs, हैलोन, कार्बन टेट्राक्लोराइड, मिथाइल क्लोरोफॉर्म और HCFCs जैसे ओजोन-क्षयकारी पदार्थों को नियंत्रित करने के प्रयास किए गए।
वहीं 2016 में अपनाया गया किगाली संशोधन ओजोन संरक्षण को जलवायु परिवर्तन से जोड़ता है।
इसके तहत अधिक ग्लोबल वार्मिंग क्षमता वाली HFC गैसों के उपयोग में चरणबद्ध कमी का प्रावधान है।
हिमालयी क्षेत्रों में UV जागरूकता पर जोर
डॉ. गौतम ने कहा कि हिमालयी क्षेत्रों में अधिक ऊंचाई के कारण UV विकिरण को लेकर जागरूकता जरूरी है।
उन्होंने लोगों से तेज धूप के दौरान लंबे समय तक सीधे संपर्क से बचने की अपील की।
जरूरत के अनुसार टोपी, छाता, UV सुरक्षा वाले चश्मे और उपयुक्त कपड़ों के इस्तेमाल की सलाह दी गई है।
उन्होंने कहा कि नैनीताल, मसूरी और अन्य हिमालयी क्षेत्रों से लंबे समय के वायुमंडलीय आंकड़ों का अध्ययन क्षेत्रीय ओजोन, UV विकिरण और जलवायु परिवर्तन को समझने में मदद कर सकता है।
अंटार्कटिका से हिमालय तक शोध का अनुभव
डॉ. आलोक सागर गौतम ने अपने 28वें भारतीय अंटार्कटिक वैज्ञानिक अभियान के अनुभवों का भी उल्लेख किया।
उन्होंने कहा कि ध्रुवीय क्षेत्रों में ओजोन और वायुमंडलीय प्रक्रियाओं का अध्ययन वैश्विक पर्यावरणीय बदलावों को समझने में महत्वपूर्ण है।
अंटार्कटिका से लेकर हिमालय तक वैज्ञानिक निगरानी पृथ्वी की बदलती जलवायु और वातावरणीय परिस्थितियों को समझने में मदद कर सकती है।
विभागाध्यक्ष ने वैज्ञानिक पहल को बताया महत्वपूर्ण
बुलेटिन जारी करते हुए भौतिकी विभाग के विभागाध्यक्ष प्रोफेसर त्रिलोक चंद्र उपाध्याय ने इस पहल को जनहित में महत्वपूर्ण वैज्ञानिक प्रयास बताया।
उन्होंने कहा कि वैज्ञानिक शोध केवल अकादमिक संस्थानों तक सीमित नहीं रहना चाहिए।
इसके निष्कर्ष समाज, पर्यावरण संरक्षण और जनकल्याण तक पहुंचने चाहिए।
उन्होंने डॉ. आलोक सागर गौतम और उनकी शोध टीम को इस पहल के लिए बधाई दी।
नागरिकों से पर्यावरण संरक्षण में सहयोग की अपील
डॉ. गौतम ने नागरिकों से ओजोन संरक्षण और वायु प्रदूषण नियंत्रण में भागीदारी की अपील की।
उन्होंने कहा कि पुराने रेफ्रिजरेटर और एयर कंडीशनर को खुले में या गलत तरीके से नष्ट नहीं किया जाना चाहिए। इनमें मौजूद रेफ्रिजरेंट की सुरक्षित रिकवरी और निपटान जरूरी है।
उन्होंने एयर कंडीशनिंग और रेफ्रिजरेशन उपकरणों की नियमित सर्विस कराने, गैस रिसाव रोकने और ऊर्जा दक्ष उपकरणों को प्राथमिकता देने की सलाह दी।
उन्होंने वाहन उत्सर्जन और अन्य प्रदूषण स्रोतों को कम करने में भी लोगों से सहयोग की अपील की।
डॉ. गौतम ने कहा कि ओजोन परत की सुरक्षा केवल वैज्ञानिकों या सरकारों की जिम्मेदारी नहीं है। प्रत्येक नागरिक की छोटी पर्यावरणीय जिम्मेदारी मिलकर पृथ्वी के सुरक्षित भविष्य की नींव रख सकती है।















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