स्थानीय वन उपज को दिया नया आयाम, मदमहेश्वर घाटी में ग्रामीण स्वरोजगार की मिसाल
ऊखीमठ: मदमहेश्वर घाटी की ग्राम पंचायत गैड़ बष्टी के प्रगतिशील काश्तकार बलवीर राणा ने पारंपरिक
वन उपज ‘धनधूरा’ का अचार तैयार कर स्थानीय उत्पाद को नई पहचान दी है।
सीमित संसाधनों में नवाचार करते हुए उन्होंने यह साबित किया कि पहाड़
की वनस्पतियां भी आजीविका का सशक्त माध्यम बन सकती हैं।
औषधीय गुणों से भरपूर ‘धनधूरा’ को व्यावसायिक पहचान
धनधूरा, जिसे हिंदी में ‘तेजफल’ या ‘टिमूर’ भी कहा जाता है, हिमालयी क्षेत्रों में पाई
जाने वाली सुगंधित एवं औषधीय वनस्पति है।
आयुर्वेद में इसके फल, छाल और पत्तियों का उपयोग लंबे समय से किया जाता रहा है।
इसमें प्राकृतिक एंटीऑक्सीडेंट, जीवाणुरोधी और सूजनरोधी गुण पाए जाते हैं।
पारंपरिक रूप से इसका उपयोग दांत दर्द, पाचन संबंधी समस्याओं,
सर्दी-जुकाम और त्वचा रोगों में लाभकारी माना जाता है।
पहाड़ी व्यंजनों में मसाले के रूप में इसका प्रयोग विशिष्ट सुगंध और स्वाद प्रदान करता है।
छोटे प्रयोग से शुरू हुआ बड़ा प्रयास
बलवीर राणा ने बताया कि पहले धनधूरा का उपयोग केवल सीमित मात्रा में मसाले के रूप में होता था।
उन्होंने इसके स्वाद और औषधीय गुणों को ध्यान में रखते हुए अचार बनाने का प्रयोग शुरू किया।
प्रारंभ में छोटे स्तर पर तैयार अचार को स्थानीय बाजार में उपलब्ध कराया गया, जिसे उपभोक्ताओं ने सराहा।
सकारात्मक प्रतिक्रिया के बाद उत्पादन बढ़ाया गया। अचार निर्माण में स्वच्छता, गुणवत्ता और
पारंपरिक विधि का विशेष ध्यान रखा गया।
सरसों के तेल और स्थानीय मसालों से तैयार यह अचार स्वादिष्ट होने के साथ स्वास्थ्यवर्धक भी है।
कृषि विज्ञान केंद्र ने की सराहना
हाल ही में बष्टी तोक के भ्रमण पर पहुंचे कृषि विज्ञान केंद्र जाखधार के वैज्ञानिकों ने
बलवीर राणा के प्रयासों की सराहना की। उन्होंने इसे स्थानीय संसाधनों पर आधारित सफल नवाचार बताया।

पलायन रोकने का उपाय: स्थानीय संसाधनों पर आधारित स्वरोजगार
बलवीर राणा का मानना है कि पहाड़ से पलायन रोकने के लिए स्थानीय उत्पादों का मूल्य संवर्धन आवश्यक है।
उन्होंने युवाओं से अपील की कि पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक तकनीक से जोड़कर नए स्वरोजगार के अवसर तलाशें।
प्रधान संगठन ब्लॉक महामंत्री मदन भट्ट ने कहा कि यदि शासन-प्रशासन द्वारा प्रशिक्षण,
पैकेजिंग और विपणन की सुविधा उपलब्ध कराई जाए तो धनधूरा जैसे उत्पाद राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बना सकते हैं।
यह पहल न केवल ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सशक्त बना रही है,
बल्कि यह संदेश भी दे रही है कि पहाड़ की वनस्पतियां आजीविका और स्वास्थ्य दोनों की मजबूत आधारशिला बन सकती हैं।















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