उमा घिल्डियाल
अपराध को झूठ की कितनी ही परतों में छिपाया जाए, वह एक दिन अवश्य सामने आ ही जाता है।
समय, परिस्थितियाँ और कभी-कभी प्रकृति भी उसकी गवाही बन जाती है। यही संदेश देती है कथा “बुलबुलों की गवाही”।
एक गाँव में एक मुखिया रहता था। वह बहुत लालची स्वभाव का था।
उसकी इच्छा थी कि गाँव में सबसे अधिक धन-संपत्ति उसी के पास रहे और कोई दूसरा उससे अधिक समृद्ध न हो।
इसी लालच में वह अक्सर गलत रास्ते अपनाने से भी नहीं हिचकिचाता था।
उसी गाँव का एक फौजी लंबे समय बाद ड्यूटी से अपने घर लौट रहा था।
उसने अपने परिवार को खबर भेजी थी कि वह जल्द पहुँचने वाला है। घर में उसकी पत्नी और बच्चे खुशी से उसका इंतजार कर रहे थे।
जब वह स्टेशन पर उतरा, तभी संयोग से गाँव का मुखिया अपनी गाड़ी लेकर वहाँ मिला। उसने बड़े अपनत्व से कहा,
“आओ, मेरे साथ चलो, मैं तुम्हें घर छोड़ देता हूँ।”
फौजी ने भरोसा किया और उसके साथ बैठ गया।
अपराध की कहानी
कुछ दूर जाने के बाद मुखिया के मन में लालच जाग उठा।
उसने सोचा कि इतने समय बाद लौट रहा यह फौजी जरूर अपने साथ धन और कीमती सामान लाया होगा। इसी लालच में उसने गाँव जाने वाला सीधा रास्ता छोड़कर सुनसान जंगल का रास्ता पकड़ लिया।
जंगल में घने पेड़ों के बीच तेज बारिश हो रही थी।
बिजली बार-बार चमक रही थी। मुखिया ने एक बड़े पेड़ के नीचे गाड़ी रोक दी।
उसके मन में अपराध की भावना पूरी तरह हावी हो चुकी थी। उसने तलवार निकाल ली और फौजी पर हमला करने के लिए आगे बढ़ा।
फौजी ने डरते हुए कहा,
“तुम बहुत गलत कर रहे हो। एक दिन तुम्हें इसकी सजा जरूर मिलेगी।”
मुखिया हँस पड़ा और बोला,
“मुझे कौन देख रहा है? कौन गवाही देगा?”
उसी समय बारिश की बूंदें पास के पानी भरे गड्ढों में गिर रही थीं और उनमें छोटे-छोटे बुलबुले उठ रहे थे। फौजी ने अंतिम बार कहा,
“ये बुलबुले मेरी गवाही देंगे।”
इतना कहकर वह मुखिया की तलवार का शिकार हो गया। मुखिया उसका सामान और धन लेकर अपने घर लौट आया।
समय बीतता गया। धीरे-धीरे लोगों ने देखा कि मुखिया के घर में अचानक बहुत समृद्धि आ गई है।
उसकी पत्नी महंगे गहने पहनने लगी, घर बड़ा बन गया, और जीवन में ऐशो-आराम बढ़ गया।
गाँव वाले हैरान जरूर थे, पर सच्चाई किसी को पता नहीं थी।
अपराध की परतें और बुलबुलों की गवाही
देखते ही देखते 18 वर्ष बीत गए।
एक दिन फिर वैसी ही तेज बारिश हो रही थी। मुखिया अपने आँगन में बैठा था और उसकी पत्नी कपड़े धो रही थी।
साबुन के पानी में छोटे-छोटे बुलबुले उठ रहे थे। उन्हें देखकर मुखिया हँसते हुए बोला,
“उस दिन फौजी ने कहा था कि बुलबुले गवाही देंगे। आज 18 साल हो गए, लेकिन कोई गवाही देने नहीं आया।”
उसकी पत्नी यह सुनते ही सब समझ गई। उसे एहसास हो गया कि उसके पति ने ही उस फौजी की हत्या की थी।
वह तुरंत थाने पहुँची और पूरी सच्चाई पुलिस को बता दी। इस तरह वर्षों पुराना अपराध आखिरकार सामने आ गया और मुखिया को उसके कर्मों का दंड मिला।
यह कहानी हमें सिखाती है कि अपराध चाहे कितना भी छिपाया जाए, एक दिन स्वयं बोल उठता है।
कभी प्रकृति, कभी समय और कभी हमारे अपने शब्द ही उसके गवाह बन जाते हैं।




















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