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चौखुटिया में तेंदुए-भालू का आतंक: एक महीने में दर्जनों घटनाएं

डर के साए में जीने को मजबूर ग्रामीण

नए साल की शुरुआत जहां शहरों में जश्न और खुशियों के साथ हुई, वहीं चौखुटिया क्षेत्र के ग्रामीण इलाकों में हर दिन डर, दहशत और असुरक्षा के माहौल में गुजर रहा है।

गेवाड़ घाटी से लेकर सिमलखेत, टटलगांव और मोहणा तक तेंदुए और भालू का बढ़ता आतंक अब केवल वन्यजीव समस्या नहीं, बल्कि एक गंभीर मानवीय संकट बनता जा रहा है।

एक महीने में हमलों की लंबी फेहरिस्त

वरिष्ठ पत्रकार हेम कांडपाल द्वारा उपलब्ध कराए गए जनवरी से अभी तक फरवरी के आंकड़े चौखुटिया क्षेत्र में स्थिति की गंभीरता को साफ बयां करते है।

  • 1 जनवरी: सुनगढ़ी खत्री गांव में तेंदुए ने गौशाला का दरवाजा तोड़कर गाय को मारा।
  • 3 जनवरी: सिमलखेत में पिंजरे में रखी बकरी पर तेंदुए का हमला, लेकिन तेंदुआ पिंजरे में नहीं फंसा।
  • 5 जनवरी: सिमलखेत पुराना लोहबा में कई मवेशियों का हत्यारा तेंदुआ पिंजरे में कैद।
  • 7 जनवरी: टटलगांव में भालू का आतंक, ग्रामीण लाठी-डंडों के साथ सतर्क।
  • 11 जनवरी: सिमलखेत और पुराना लोहबा में दो तेंदुए पकड़े गए, फिर भी तीन और तेंदुओं के घूमने की पुष्टि।
  • 21 जनवरी: टटलगांव में दिनदहाड़े बच्चों के साथ चहल-कदमी करता तेंदुआ।
  • 30 जनवरी: खड़कतया और थनीगांव में तीन मवेशियों को तेंदुए ने मारा, बच्चों का स्कूल जाना मुश्किल।
  • 2 फरवरी: बौनीगाड़ में स्कूल के पीछे तेंदुआ मृत मिला।
  • 9 फरवरी: मोहणा गांव में गौशाला तोड़कर दो गायों की हत्या।
  • 10 फरवरी: घुड़साली में बछड़े पर हमला, ग्रामीणों ने फिर पिंजरा लगाने की मांग उठाई।

पिंजरे में पकड़ो, फिर कहां छोड़ते हो?

ग्रामीणों में सबसे बड़ा आक्रोश वन विभाग की कार्यप्रणाली को लेकर है। लोगों का कहना है कि तेंदुओं को पकड़ने के बाद उन्हें कहां छोड़ा जा रहा है, इसकी कोई पारदर्शिता नहीं है।

यही वजह है कि यह चर्चा आम हो गई है कि तेंदुओं को एक जगह से पकड़कर पास के ही किसी दूसरे इलाके में छोड़ दिया जाता है।

ग्रामीणों की मांग है कि तेंदुओं को पकड़ने से लेकर छोड़ने तक की पूरी प्रक्रिया की वीडियो रिकॉर्डिंग सार्वजनिक की जाए, ताकि भ्रम की स्थिति खत्म हो और विश्वास बहाल हो।

रिवर्स पलायन का सपना टूटने की कगार पर

सरकार जहां रिवर्स पलायन की बात कर रही है, वहीं जमीनी हकीकत इसके उलट नजर आ रही है। यदि हालात ऐसे ही रहे तो वह दिन दूर नहीं जब जान बचाने के लिए लोग मजबूरन शहरों की ओर पलायन करेंगे।

मवेशियों की लगातार हो रही हत्याएं ग्रामीण अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ रही हैं।

अब ठोस नीति की जरूरत

चौखुटिया क्षेत्र के हालात साफ संकेत दे रहे हैं कि यह समस्या अब टालने योग्य नहीं रही। शासन-प्रशासन और वन विभाग को बस्तियों की ओर बढ़ते जंगली जानवरों के हमलों को रोकने के लिए तत्काल और ठोस नीति बनानी होगी।

केवल पिंजरे लगाना काफी नहीं, बल्कि स्थायी समाधान और पारदर्शी कार्रवाई समय की मांग है।
वरना डर के इस साये में जी रहा पहाड़ और ज्यादा खाली होता चला जाएगा।

https://regionalreporter.in/a-video-containing-death-threats-has-gone-viral-on-social-media/
https://youtu.be/YqmyQUT-vwc?si=XTNIef18QLBHwlAR
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