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श्रीनगर की 130 साल पुरानी रामलीला

श्रीनगर की रामलीला सिर्फ धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि करीब 130 साल पुरानी सांस्कृतिक विरासत है।

यहां मंच पर राम, सीता और रावण की कथाओं के साथ उन कलाकारों का समर्पण भी दिखाई देता है,

जिन्होंने अपनी जिंदगी का बड़ा हिस्सा इस परंपरा को संजोने में लगाया है।

कोई सात साल से अभिनय कर रहा है, तो कोई 1981 से रामलीला के मंच पर सक्रिय है।

नई पीढ़ी के कलाकार भी अब इस विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं।

सात साल से मंच पर आरुषि, इस बार निभा रहीं सीता का किरदार

इस वर्ष सीता की भूमिका निभा रहीं आरुषि डोभाल अपने अभिनय से दर्शकों की सराहना बटोर रही हैं।

वह पिछले सात वर्षों से रामलीला से जुड़ी हैं। उन्होंने शुरुआत गौरी के पात्र से की थी। इसके बाद अहिल्या, तारा और गंगा सहित कई भूमिकाएं निभाईं।

आरुषि बताती हैं कि शुरुआत में मंच पर अभिनय करने में झिझक होती थी, लेकिन लगातार अभ्यास से आत्मविश्वास बढ़ा।

सीता की भूमिका मिलने पर भी मन में थोड़ी घबराहट थी।

पिता और निर्देशक के मार्गदर्शन में उन्होंने तैयारी की और नियमित रूप से करीब तीन घंटे अभ्यास किया। मंचन से पहले भी रिहर्सल जारी रही।

2021 में राम बने अभिषेक, अंतिम सप्ताह में बढ़ाया अभ्यास

भगवान राम की भूमिका निभा रहे अभिषेक रावत वर्ष 2021 में ऑडिशन के जरिए रामलीला से जुड़े थे।

शुरुआत में उन्होंने राम का पात्र निभाया। इसके बाद दो साल तक भरत की भूमिका की और फिर दोबारा राम के किरदार में लौटे।

इस वर्ष सीता की भूमिका में बदलाव के कारण दोनों कलाकारों के बीच तालमेल बैठाना चुनौतीपूर्ण था।

अभिषेक के मुताबिक, अंतिम सप्ताह में प्रतिदिन चार से पांच घंटे अभ्यास किया गया।

निर्देशक ने राम, सीता और रावण से जुड़े दृश्यों की विशेष रिहर्सल कराई, जिससे मंचन के दौरान तालमेल बनाने में मदद मिली।

महिला पात्र निभाकर सामाजिक सोच को चुनौती दे रहे प्रियव्रत जोशी

रामलीला के कलाकार प्रियव्रत जोशी गौरी, गंगा, दुर्गा, काली, सीता, मंदोदरी और पार्वती जैसे महिला पात्र निभा चुके हैं।

अभिनय के साथ वह महिला पात्रों की वेशभूषा तैयार करने में भी योगदान देते हैं।

प्रियव्रत बताते हैं कि अपनी लंबाई के कारण उन्हें अधिकतर महिला पात्रों की भूमिकाएं मिलीं।

हालांकि, एक पुरुष होकर महिला का किरदार निभाने पर उन्हें लोगों के ताने भी सुनने पड़े। उनसे पूछा जाता था कि ऐसे पात्र निभाने में उन्हें शर्म नहीं आती।

प्रियव्रत का मानना है कि कलाकार का काम पात्र को जीवंत करना और संस्कृति को आगे बढ़ाना है।

अभिनय को स्त्री या पुरुष की सीमाओं में नहीं बांधना चाहिए।

उन्होंने अपनी दिवंगत मां को भी याद किया, जो महिला पात्रों के लिए उन्हें तैयार करने और उनका हौसला बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती थीं।

1981 से रामलीला में सक्रिय हैं पंकज बडोनी

पंकज बडोनी वर्ष 1981 से रामलीला के मंच पर सक्रिय हैं। शुरुआती तीन वर्षों तक उन्होंने सीता की भूमिका निभाई।

इसके बाद लक्ष्मण सहित कई पात्र निभाए और आगे चलकर कैकेयी के किरदार के लिए पहचान बनाई।

वह मेघनाद जैसे पात्रों का अभिनय भी कर चुके हैं।

पंकज के अनुसार, हर भूमिका कलाकार को नया अनुभव देती है। कैकेयी का किरदार खास तौर पर चुनौतीपूर्ण है,

क्योंकि इसमें भावनाओं, संवादों और प्रभावशाली अभिनय का संतुलन जरूरी है।

महिला कलाकारों की भागीदारी और ऑडिशन के जरिए चयन पर पूछे गए

सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि कैकेयी की भूमिका के लिए उन्हें अब तक अपने स्तर का उपयुक्त कलाकार नहीं मिला।

परिवारों के समर्पण से आगे बढ़ रही विरासत

रामलीला समिति के संरक्षक हरि प्रसाद उनियाल ने बताया कि उनका परिवार लंबे समय से इस आयोजन से जुड़ा है।

उन्होंने बचपन में ही अभिनय शुरू कर दिया था। उस दौर में मंच और अन्य व्यवस्थाएं सीमित थीं, लेकिन लोगों की आस्था और उत्साह बना रहता था।

समिति से जुड़े एक वरिष्ठ सदस्य ने भी रामलीला के प्रति परिवारों के समर्पण को याद किया।

उन्होंने बताया कि उनके बड़े भाई ने रामलीला के लिए अपनी सरकारी नौकरी तक छोड़ दी थी।

उन्होंने स्वयं भारतीय सेना में 26 वर्षों की सेवा के दौरान भी इस आयोजन के लिए समय निकाला।

उनके अनुसार, पहले बिना माइक के कलाकारों की आवाज दर्शकों तक पहुंचती थी।

आज प्रिंट मीडिया के साथ फेसबुक और यूट्यूब पर भी रामलीला का लाइव प्रसारण किया जा रहा है।

संगीत, अभिनय और दर्शकों की भागीदारी बनी पहचान

आयोजन से जुड़े सागर ने बताया कि पिछले कुछ वर्षों में दर्शकों की भागीदारी और उत्साह बढ़ा है।

कलाकारों को तैयार करने, रिहर्सल कराने और मंच की व्यवस्थाएं संभालने में पूरी टीम की भूमिका रहती है।

अभिनय के साथ पृष्ठभूमि संगीत, गायन और महिला पात्रों की प्रस्तुतियों को भी सराहना मिल रही है।

आयोजकों के अनुसार, बच्चे, युवा और बुजुर्ग देर रात तक रामलीला देखने के लिए रुकते हैं।

वहीं, पूरन सिंह वर्ष 2006 में पहली बार सीता की सखी बने थे। वर्ष 2008 से वह लगातार मंत्री का पात्र निभा रहे हैं।

उनका कहना है कि रामलीला में हर भूमिका महत्वपूर्ण है और कलाकार अपनी जिम्मेदारी पूरी निष्ठा से निभाने का प्रयास करते हैं।

करीब 130 साल पुरानी श्रीनगर की रामलीला आज भी कलाकारों के अनुभव, नई पीढ़ी के उत्साह और परिवारों के समर्पण से आगे बढ़ रही है।

यहां परंपरा केवल मंच पर निभाए जाने वाले पात्रों में नहीं, बल्कि उन लोगों के जीवन में भी दिखाई देती है,

जिन्होंने सामाजिक टिप्पणियों और सीमित संसाधनों के बावजूद इस सांस्कृतिक विरासत को जीवित रखा है।

https://regionalreporter.in/pithoragarh-india-japan-cultural-skill-development-program/
https://youtu.be/XiH8nF-oU-c?si=1jC9qjWaB_90OxYS
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