रीजनल रिपोर्टर

सरोकारों से साक्षात्कार

स्कॉलरशिप मिलते ही पढ़ाई छोड़ने का ट्रेंड

नंदा गौरा योजना पर गंभीर पुनर्विचार की जरूरत

डॉ. सुशील उपाध्याय

उत्तराखंड सरकार द्वारा उच्च शिक्षा में बालिकाओं की भागीदारी बढ़ाने के उद्देश्य से

शुरू की गई नंदा गौरा छात्रवृत्ति योजना ने पहले वर्ष में पंजीकरण के स्तर पर उल्लेखनीय सफलता दर्ज की है,

लेकिन इसके साथ ही एक चिंताजनक प्रवृत्ति भी सामने आ रही है-छात्रवृत्ति की राशि मिलते ही बड़ी संख्या में छात्राओं का पढ़ाई छोड़ देना।

यह स्थिति न केवल योजना के मूल उद्देश्य पर सवाल खड़े करती है, बल्कि राज्य की उच्च शिक्षा प्रणाली के लिए भी चेतावनी है।

पंजीकरण बढ़ा, निरंतरता घटी

भारत सरकार का लक्ष्य है कि 17–23 वर्ष आयु वर्ग के 50 प्रतिशत युवाओं को उच्च शिक्षा से जोड़ा जाए।

इस दिशा में उत्तराखंड अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति में है।

ऑल इंडिया सर्वे ऑन हायर एजुकेशन के अनुसार, राज्य में इस आयु वर्ग के 40 प्रतिशत से अधिक युवा स्नातक स्तर पर पंजीकृत हैं

और लड़कियों की भागीदारी लगभग बराबरी की है।

2025–26 में यह आंकड़ा 45 प्रतिशत से अधिक होने का अनुमान है।

इस वृद्धि में छात्रवृत्ति योजनाओं की अहम भूमिका रही है, लेकिन समस्या तब शुरू होती है जब प्रथम वर्ष के बाद छात्राओं की संख्या तेजी से घटने लगती है। यही ड्रॉपआउट ट्रेंड आज सबसे बड़ा सवाल बन चुका है।

समस्या की जड़: एकमुश्त राशि का दुरुपयोग

योजना के तहत 12वीं के बाद राज्य के कॉलेज या विश्वविद्यालय में

प्रवेश लेने वाली छात्राओं को 51 हजार रुपये की एकमुश्त राशि दी जाती है।

यह राशि ग्रामीण क्षेत्रों में बीए, बीएससी, बीकॉम जैसी सामान्य डिग्री करने वाली छात्राओं के लिए बेहद आकर्षक है।

लेकिन वास्तविकता यह है कि गरीब परिवारों में यह धनराशि अक्सर शिक्षा पर खर्च होने के बजाय घरेलू जरूरतों में खप जाती है।

कई मामलों में अभिभावकों की रुचि छात्रा की नियमित पढ़ाई से अधिक इस राशि को प्राप्त करने में दिखाई देती है।

परिणामस्वरूप, अगले सत्र में एक चौथाई से अधिक छात्राएं पढ़ाई छोड़ देती हैं।

क्या हो सकते हैं व्यावहारिक समाधान

इस स्थिति से निपटने के लिए योजना के क्रियान्वयन में कुछ ठोस बदलाव आवश्यक हैं:

1. किस्तों में भुगतान व्यवस्था

51 हजार रुपये की राशि को एक साथ देने के बजाय तीन किस्तों में जारी किया जाए—

  • प्रवेश के समय
  • प्रथम वर्ष उत्तीर्ण करने पर
  • दूसरे वर्ष के बाद तीसरे वर्ष में प्रवेश पर
    चार वर्षीय स्नातक कार्यक्रम चुनने वाली छात्राओं को चौथे वर्ष अतिरिक्त प्रोत्साहन दिया जा सकता है।

2. बायोमेट्रिक उपस्थिति से जोड़ना

सरकार द्वारा निर्धारित न्यूनतम 180 दिन की उपस्थिति को आधार बनाकर छात्रवृत्ति को जोड़ा जाए।

प्रति बायोमेट्रिक उपस्थिति 100 रुपये की प्रोत्साहन राशि तय कर वर्ष के अंत में वास्तविक उपस्थिति के अनुसार भुगतान किया जाए।

इससे कक्षाओं में उपस्थिति भी बढ़ेगी और ड्रॉपआउट भी घटेगा।

3. मेरिट आधारित अतिरिक्त प्रोत्साहन

75 प्रतिशत या उससे अधिक अंक प्राप्त करने वाली छात्राओं को अतिरिक्त राशि देने से

शैक्षणिक गुणवत्ता और प्रतिस्पर्धा दोनों को बढ़ावा मिल सकता है।

गुणवत्ता बनाम संख्या

अब उत्तराखंड के सामने चुनौती केवल पंजीकरण (GER) बढ़ाने की नहीं, बल्कि शिक्षा की गुणवत्ता (QER) सुनिश्चित करने की है।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति भी निरंतर अध्ययन, लचीलापन और स्नातकोत्तर तक शैक्षणिक प्रवाह पर जोर देती है।

ऐसे में छात्रवृत्ति योजनाओं को केवल प्रवेश तक सीमित न रखकर डिग्री पूर्णता से जोड़ना समय की मांग है।

https://regionalreporter.in/tiger-attack-in-ramnagar-forest-division/
https://youtu.be/4YpBHDqdgKM?si=TU1O_YQuzw-0xoGi
Website |  + posts

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: