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सरोकारों से साक्षात्कार

नागेंद्र सकलानी और मोलू भरदारी की शहादत

टिहरी रियासत के ताबूत में अंतिम कील

11 जनवरी 1948: वह दिन जिसने टिहरी की राजशाही के अंत पर निर्णायक हस्ताक्षर किए

11 जनवरी 1948, कीर्तिनगर, यह तारीख टिहरी के जनसंघर्ष के इतिहास में

केवल दो शहीदों की कुर्बानी की स्मृति नहीं है, बल्कि यह उस राजशाही के अंत की निर्णायक घड़ी थी,

जो दशकों तक किसानों, जनसाधारण और स्वतंत्रता सेनानियों के खून से अपने सिंहासन को सींचती रही।

नागेंद्र सकलानी और मोलू भरदारी की शहादत ने टिहरी रियासत के ताबूत में अंतिम कील ठोंक दी।

वही राजशाही जिसने तिलाड़ी में किसानों का खून बहाया

यह वही टिहरी राजशाही थी जिसने

  • 30 मई 1930 को तिलाड़ी में सैकड़ों किसानों का नरसंहार किया
  • उत्तरदायी शासन की मांग करने वाले श्रीदेव सुमन को जेल में 84 दिन की भूख हड़ताल के बाद मरने के लिए छोड़ दिया

श्रीदेव सुमन की एक ही मांग थी-

टिहरी में उत्तरदायी शासन और उनके मुकदमे की सुनवाई स्वयं महाराजा करें।

राजशाही ने जवाब में उनका मृत शरीर बोरे में बंद कर भिलंगना नदी में बहा दिया।

श्रीदेव सुमन के बाद कमजोर पड़ा आंदोलन, पर झुके नहीं नागेंद्र सकलानी

श्रीदेव सुमन की शहादत के बाद टिहरी में राजशाही विरोधी आंदोलन कुछ समय के लिए कमजोर पड़ा।

प्रजामंडल बिखर चुका था, नेतृत्व पस्त था लेकिन नागेंद्र सकलानी चुप बैठने वालों में नहीं थे।

देहरादून में पढ़ते हुए वे 1942 के आसपास भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़े।

कॉमरेड ब्रिजेंद्र कुमार के साथ मिलकर उन्होंने केरोसीन, नमक, राशन जैसी जरूरी वस्तुओं को लेकर जनआंदोलन संगठित किए।

विरोधियों को भी जोड़ने वाला जननेता

25 जुलाई 1945 को श्रीदेव सुमन के पहले शहादत दिवस पर देहरादून में आयोजित कार्यक्रम में नागेंद्र सकलानी ने निर्णायक भूमिका निभाई।

इस आयोजन में उन्होंने ऐसे लोगों को भी जोड़ा जो कट्टर कम्युनिस्ट विरोधी थे।

टिहरी से कम्युनिस्ट विधायक रहे गोविंद सिंह नेगी लिखते हैं:

“उस समय क्या मालूम था कि यह दस मिनट की मुलाकात मेरी जिंदगी की पूरी धारा बदल देगी।”

यह आयोजन टिहरी मुक्ति के लिए एकता की पहली सुनहरी कड़ी बना।

राजशाही का क्रूर चेहरा

कॉमरेड ब्रिजेंद्र कुमार अपने संस्मरणों में लिखते हैं कि

  • टिहरी में कहा जाता था: “20 कलम, 36 रकम”
  • बाहर से आने वाले हर सामान पर कर
  • लगान चार-पांच गुना
  • न देने पर मारपीट और जेल

यहाँ तक कि तुलसीदास की चौपाई-

“जासु राज प्रिय प्रजा दुखारी…”

पढ़ने पर भी जेल भेज दिया जाता था।
“जय हिंद” का नारा और गांधी टोपी भी अपराध थी।

कीर्तिनगर: जब जनता ने सत्ता छीन ली

10 जनवरी 1948 को नागेंद्र सकलानी कीर्तिनगर पहुंचे।

सभा के बाद जनता ने राजा के न्यायालय पर तिरंगा फहरा दिया और आजाद पंचायत की घोषणा कर दी।

11 जनवरी को राजा की सेना ने न्यायालय पर कब्जा करने की कोशिश की। आँसू गैस, फिर गोलियाँ चलीं।

  • पहली गोली मोलू भरदारी को लगी, वे शहीद हो गए
  • नागेंद्र सकलानी ने गोली चलाने वाले अफसर का पैर पकड़ लिया
  • दूसरी गोली नागेंद्र सकलानी को लगी, वे भी शहीद हो गए

शहादत जिसने राजशाही को गिरा दिया

अगले दिन चंद्र सिंह गढ़वाली की अगुवाई में हजारों लोगों ने दोनों शहीदों का जनाजा कंधों पर उठा कर टिहरी की ओर पैदल कूच किया।

ब्रिजेंद्र कुमार लिखते हैं:

“शहीदों का जनाजा सम्मान से चल रहा था, और राजतंत्र का जनाजा पैरों तले रौंदा जा रहा था।”

1949 में टिहरी रियासत का भारत में विलय हुआ।

शहीदों के परिजन और लोकतंत्र का विद्रूप

मोलू भरदारी की पत्नी सुरमा भरदारी 14 वर्ष की उम्र में विधवा हुईं।

25 साल बाद उन्हें मात्र ₹15 पेंशन मिली, जो एक गुमनाम शिकायत पर यह कहकर बंद कर दी गई कि उन्होंने पुनर्विवाह कर लिया है।

प्रख्यात लेखक विद्यासागर नौटियाल अपनी पुस्तक भीम अकेला में इस अन्याय को दर्ज करते हैं।

और दूसरी तरफ…

जिस राजपरिवार के हाथ तिलाड़ी, श्रीदेव सुमन और कीर्तिनगर के खून से रंगे थे—

उसके वारिस आज संसद में “माननीय” हैं। यह लोकतंत्र नहीं, लोकतंत्र का मखौल है।

https://regionalreporter.in/pahalgam-attack-mastermind-admits-pakistan-army-links/
https://youtu.be/xhjYYDV646Q?si=Tn8VQiYbdEG6ZGIr
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