सुप्रीम कोर्ट ने किशोरों के प्रेम संबंधों से जुड़े मामलों में पॉक्सो (POCSO) अधिनियम के इस्तेमाल पर सवाल उठाए हैं।
अदालत ने कहा कि 15 से 18 वर्ष की उम्र बेहद संवेदनशील होती है
और ऐसे मामलों में व्यावहारिक तथा संतुलित दृष्टिकोण अपनाने की जरूरत है।
मामले की अगली सुनवाई 17 जुलाई को होगी।
बेंच ने क्या कहा
जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ किशोरों की निजता के अधिकार से जुड़े स्वत: संज्ञान मामले की सुनवाई कर रही थी।
सुनवाई के दौरान अदालत ने पूछा कि यदि कोई किशोर-किशोरी साथ घर छोड़ देते हैं तो राज्य इसे कैसे रोक सकता है।
अदालत ने कहा कि पॉक्सो कानून का उद्देश्य बच्चों को यौन शोषण और उत्पीड़न से बचाना है,
इसलिए हर मामले में इसे लागू करना उचित नहीं हो सकता।
माता-पिता के रवैये पर भी टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कई मामलों में किशोरों के घर छोड़ने पर माता-पिता सामाजिक प्रतिष्ठा बचाने के लिए आपराधिक मुकदमे दर्ज करा देते हैं।
अदालत ने इस तरह के मामलों में संवेदनशील और व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता बताई।
POCSO कानून के उद्देश्य पर जोर
सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि पॉक्सो कानून 2012 में बच्चों के यौन शोषण और परिवार
या परिचितों द्वारा किए जाने वाले अपराधों से सुरक्षा के लिए बनाया गया था।
अदालत ने यह भी कहा कि उसके निर्देश व्यावहारिक होने चाहिए
और कानून के मूल उद्देश्य को ध्यान में रखकर ही निर्णय लिए जाने चाहिए।















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