दो महीने की जंग के बाद मां की गोद में लौटी खुशियां
मां के लिए बच्चे का जन्म जिंदगी का सबसे खुशनुमा पल होता है, लेकिन रुद्रप्रयाग की अल्पना नौटियाल के लिए यह खुशी उस वक्त चिंता में बदल गई,
जब उनकी डिलीवरी गर्भावस्था के महज 25वें सप्ताह में हो गई।
जन्म के समय बच्चे का वजन सिर्फ 700 ग्राम था।
इतने कम वजन और बेहद कम गर्भकाल में जन्म लेने के कारण नवजात की हालत गंभीर थी।
उसके लिए शुरुआती हर घंटा बेहद अहम था। बच्चे को बेहतर उपचार के लिए श्रीनगर के बेस चिकित्सालय स्थित नीक्कू वार्ड में भर्ती कराया गया।
करीब दो महीने तक चली चिकित्सकीय देखभाल के बाद तस्वीर बदलने लगी।
बच्चे का वजन धीरे-धीरे बढ़ा और वह 1.3 किलो तक पहुंच गया।
सबसे बड़ी राहत तब मिली, जब उसने मां का दूध लेना शुरू कर दिया। हालत स्थिर होने के बाद डॉक्टरों ने उसे घर भेजने का फैसला किया।
700 ग्राम के बच्चे की लड़ाई आसान नहीं थी
25 सप्ताह में जन्म लेने वाले बच्चे को सामान्य नवजात की तुलना में कई गुना ज्यादा चिकित्सकीय निगरानी की जरूरत होती है।
शरीर का वजन बेहद कम होने के साथ-साथ फेफड़े और दूसरे अंग पूरी तरह विकसित नहीं होते। संक्रमण का खतरा भी काफी अधिक रहता है।
ऐसे में बच्चे को लगातार मॉनिटरिंग, पोषण, दवाओं और जरूरत पड़ने पर श्वसन संबंधी सहायता की आवश्यकता होती है।
बेस अस्पताल के नीक्कू वार्ड में इसी तरह की सुविधाओं और लगातार निगरानी के बीच बच्चे का उपचार किया गया।
अल्पना के लिए अस्पताल से बच्चे को स्वस्थ हालत में घर ले जाने का दिन भावुक कर देने वाला रहा।
करीब दो महीने तक अस्पताल में रहने के बाद जब बच्चा मां की गोद में पहुंचा तो परिवार की चिंता खुशी में बदल गई।
डॉक्टरों ने बच्चे को दिया ‘नीक्कू ग्रेजुएट’ का नाम
बच्चे की छुट्टी का पल नीक्कू वार्ड की टीम के लिए भी खास था।
डॉक्टरों और नर्सिंग स्टाफ ने नवजात को ‘नीक्कू ग्रेजुएट’ के तौर पर विदाई दी।
बच्चे को कैप और हुड पहनाया गया और वार्ड में केक काटकर इस उपलब्धि का जश्न मनाया गया।
परिवार के लिए यह सिर्फ अस्पताल से छुट्टी नहीं थी, बल्कि उस लंबी चिंता का अंत था जो बच्चे के जन्म के साथ शुरू हुई थी।
परिजनों ने अस्पताल की टीम को धन्यवाद देते हुए कहा कि उपचार के साथ डॉक्टरों
और नर्सिंग स्टाफ ने मुश्किल समय में परिवार का मनोबल भी बनाए रखा।
सिर्फ एक बच्चे की कहानी नहीं
बेस अस्पताल के नीक्कू वार्ड में पिछले एक साल के दौरान 25 से 30 सप्ताह के बीच जन्मे कई बेहद कम
वजन वाले नवजातों का उपचार किया गया है। इनमें रुद्रप्रयाग से रेफर होकर पहुंचे बच्चे भी शामिल हैं।
ऐसे ही एक मामले में डॉ. कृतिका का नवजात 27 सप्ताह में पैदा हुआ।
जन्म के बाद हालत गंभीर होने के कारण उसे बेस अस्पताल लाया गया।
उपचार के बाद बच्चे की स्थिति में सुधार हुआ और स्वस्थ होने पर उसे घर भेज दिया गया।
एक अन्य मामले में रुद्रप्रयाग की विनीता का प्री-मैच्योर नवजात 20 जुलाई से नीक्कू वार्ड में भर्ती था।
उपचार के बाद उसकी हालत बेहतर हुई और उसे डिस्चार्ज कर दिया गया।
जुड़वां बच्चों में एक को नहीं बचाया जा सका
30 जुलाई को रुद्रप्रयाग से आई ललिता ने 28 सप्ताह में जुड़वां बच्चों को जन्म दिया।
दोनों नवजातों की स्थिति बेहद नाजुक थी।
दुर्भाग्य से एक बच्चे की रास्ते में ही मौत हो गई, जबकि दूसरे बच्चे को नीक्कू वार्ड में उपचार मिला और बाद में उसे स्वस्थ हालत में घर भेज दिया गया।
यह मामला यह भी बताता है कि बेहद कम गर्भकाल में जन्म लेने वाले बच्चों के उपचार में किस तरह की गंभीर चुनौतियां सामने आती हैं।
निजी अस्पतालों में लाखों का खर्च
बाल रोग विभागाध्यक्ष प्रो. सीएम शर्मा के मुताबिक बेहद प्री-मैच्योर बच्चों को लंबे समय तक वेंटिलेटर सपोर्ट, दवाओं, मॉनिटरिंग और विशेषज्ञ देखभाल की जरूरत पड़ सकती है।
उनके अनुसार निजी अस्पतालों में ऐसे नवजातों के उपचार पर 15 से 20 लाख रुपये तक खर्च हो सकता है।
सरकारी व्यवस्था के तहत बेस अस्पताल में पात्र मरीजों को उपचार मिलने से आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों को बड़ी राहत मिलती है।
टीमवर्क ने बनाया मुश्किल इलाज को मुमकिन
इन नवजातों की देखभाल में बाल रोग विभागाध्यक्ष प्रो. सीएम शर्मा के साथ एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. अंकिता गिरी,
सीनियर रेजीडेंट डॉ. अजय गोस्वामी, पीजी डॉक्टरों और नीक्कू वार्ड की नर्सिंग टीम की भूमिका रही।
नीक्कू वार्ड इंचार्ज विजय फोनिया सहित नर्सिंग स्टाफ ने नवजातों की लगातार निगरानी और देखभाल की।
प्रो. सीएम शर्मा का कहना है कि 25 से 30 सप्ताह के नवजातों के मामले बेहद चुनौतीपूर्ण होते हैं।
700 ग्राम के बच्चे को स्वस्थ अवस्था में घर भेजना पूरी टीम के लिए संतोष का विषय है।
गर्भवती महिलाओं को नियमित जांच की सलाह
गायनी विभाग की असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. दीप्ति शर्मा ने गर्भवती महिलाओं से नियमित प्रसवपूर्व जांच कराने की अपील की है।
उन्होंने कहा कि पेट में लगातार दर्द, कमर में खिंचाव, पानी आना, रक्तस्राव या नियमित अंतराल पर संकुचन जैसे लक्षणों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।
समय से पहले प्रसव के संकेत मिलने पर तत्काल अस्पताल पहुंचना और बिना डॉक्टर की सलाह के दवा न लेना जरूरी है।
राजकीय मेडिकल कॉलेज श्रीनगर के प्राचार्य डॉ. सीएमएस रावत ने बाल रोग विभाग
और नीक्कू वार्ड की टीम को बधाई देते हुए कहा कि मरीजों को बेहतर और गुणवत्तापूर्ण उपचार उपलब्ध कराना संस्थान की प्राथमिकता है।
700 ग्राम से शुरू हुई इस बच्चे की जिंदगी की कहानी अब 1.3 किलो के स्वस्थ वजन और मां की गोद तक पहुंच चुकी है।
उसके लिए यह सिर्फ अस्पताल से छुट्टी नहीं, बल्कि जिंदगी की पहली बड़ी जीत है।















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