डॉ. अतुल शर्मा
“एक दिन नई सुबह उठेगी यहाँ, देखना…”
उत्तराखंड राज्य आंदोलनकारी मंच द्वारा दो दिवसीय प्रदेश स्तरीय राज्य आंदोलनकारी सम्मेलन 30 और 31 अगस्त 2026 को सुबह 10 बजे से नगर निगम हॉल में आयोजित किया जा रहा है।
मुख्य अतिथियों के सम्मान और उनके उद्बोधन के साथ अलग-अलग चार सत्रों में विचार-मंथन होगा। इसमें प्रदेश भर से राज्य आंदोलनकारी शामिल होंगे।
यह एक महत्वपूर्ण सम्मेलन होगा, ऐसी पूरी संभावना है। उत्तराखंड के सामने मौजूद चुनौतियों को लेकर अलग-अलग विषयों पर मंथन होना जरूरी भी है।
मुझे इस संदर्भ में अपना लिखा एक जनगीत याद आ गया, जो पूरे आंदोलन के दौरान सबसे अधिक गाए जाने वाले जनगीतों में शामिल रहा—
“लड़के लेंगे, भिड़ के लेंगे, छीन के लेंगे उत्तराखंड।”
इस जनगीत में पांच ‘प’ थे- पानी, पलायन, पर्यावरण, पर्यटन और पहचान।
यह जनगीत इन्हीं विषयों पर केंद्रित था। ये उत्तराखंड जनआंदोलन के प्रमुख विषय भी थे, हालांकि आंदोलन के अन्य कई मुद्दे भी थे।
इसकी एक पंक्ति आज भी लोगों को याद है-
“विकास की कहानी गांव से है दूर-दूर क्यों,
नदी पास है, मगर ये पानी दूर-दूर क्यों?”
एक पंक्ति यह भी थी-
“नौजवान खेत और गांव से बिछड़ रहा,
नौकरी की खोज में पहाड़ से उतर रहा।”
आंदोलनकारी ताकतों ने इन गीतों को रैलियों, मशाल जुलूसों और सांस्कृतिक मोर्चों के माध्यम से पूरे उत्तराखंड में गाया। इनके जरिए लोगों तक यह संदेश पहुंचा कि ये केवल गीत नहीं, बल्कि उत्तराखंड के सवाल हैं।
आज इतने वर्षों के बाद भी जब इन जनगीतों को सुनते हैं तो लगता है कि अभी बहुत से उत्तर मिलने शेष हैं।
कार्य बहुत हुआ है, लेकिन उसमें और तीव्रता आने की जरूरत है। सवाल आज भी हैं, जिनके लिए राज्य आंदोलनकारी मंच लगातार आवाज उठा रहा है।
साथ ही, व्यवस्था द्वारा किए जा रहे प्रयासों को भी अंकित किया जा रहा है।
अध्यक्ष श्री जगमोहन सिंह नेगी तथा उनके पदाधिकारियों और सदस्यों का यह प्रयास सराहनीय है। विशेषज्ञ इन विषयों पर मंथन करेंगे और व्यवस्था के साथ संवाद भी होगा।
मुझे इस सम्मेलन का निमंत्रण श्री रामलाल खंडूरी ने दिया। श्री जगमोहन सिंह नेगी, श्री प्रदीप कुकरेती आदि ने भी संपर्क किया है।
मैं सभी को इस महत्वपूर्ण आयोजन के लिए शुभकामनाएं और आशीर्वाद देता हूं।
इस अवसर पर पर्वतीय गांधी श्री इंद्रमणि बडोनी जी भी याद आ रहे हैं।
आंदोलन की अनेक स्मृतियां मन में ताजा हो रही हैं। भाई रविंद्र जुगरान की चेतना, बड़े भाई विवेकानंद खंडूरी का अनुभव और श्री वेद उनियाल की वैचारिकता याद आ रही है।
श्री रणजीत सिंह वर्मा का नेतृत्व, श्रीमती सुशीला बलूनी जी की प्रखरता और अनेक वरिष्ठ आंदोलनकारियों का योगदान भी स्मरण हो रहा है।
पत्रकारों, फोटोग्राफरों, संस्कृति कर्मियों, कर्मचारियों, पूर्व सैनिकों और मातृशक्ति के योगदान को भी कभी भुलाया नहीं जा सकता।
शहीदों का बलिदान और मातृशक्ति के साथ हुए जघन्य अत्याचारों को कौन भूल सकता है।
देहरादून का सांस्कृतिक मोर्चा, उत्तरकाशी के कला दर्पण की सौ दिनों की प्रभात फेरियां और नैनीताल समाचार के समाचार बुलेटिन की स्मृतियां मन में तैर गई हैं।
जनकवि गिर्दा, बल्ली सिंह चीमा और ज़हूर आलम के जनगीत भी इस अवसर पर याद आ रहे हैं।
अतः अंत में राज्य आंदोलनकारी सम्मेलन को पुनः शुभकामनाएं देता हूं। मेरी कामना है कि यह सम्मेलन सार्थक और सफल रहे।
अंत में अपने जनगीत की पंक्तियों के साथ बात स्पष्ट करूंगा-
“नई कहानी तिरंगे के साथ बुनी जाएगी,
हंसुली और दरांतियों की बात सुनी जाएगी।”
















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