सैटेलाइट अध्ययन ने दिखाया बदलते हिमालय का खतरा, 601 ग्लेशियर झीलों का आकार दोगुने से अधिक बढ़ा
नेपाल में हाल की विनाशकारी बाढ़ ने हिमालयी क्षेत्र की संवेदनशीलता पर फिर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
अब उपग्रह आधारित अध्ययनों ने भी ग्लेशियर झीलों के तेजी से बढ़ते आकार को लेकर चिंता बढ़ा दी है।
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) के उपग्रह आंकड़ों पर आधारित अध्ययन के अनुसार, भारतीय हिमालयी नदी घाटियों में 676 ग्लेशियर झीलों का आकार उल्लेखनीय रूप से बढ़ा है।
इनमें 130 ग्लेशियर झीलें भारत में स्थित हैं।
तेजी से बदलती हिमालयी परिस्थितियों के बीच इन्हें संभावित जोखिम के रूप में देखा जा रहा है।
601 ग्लेशियर झीलों का आकार दोगुने से ज्यादा बढ़ा
अध्ययन के अनुसार, 1984 के बाद 676 ग्लेशियर झीलों के आकार में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई।
इनमें से 601 झीलों का आकार दोगुने से अधिक बढ़ चुका है। यह आंकड़ा हिमालयी क्षेत्रों में जलवायु और भू-आकृतिक बदलाव की गंभीर तस्वीर पेश करता है।
उपग्रह आंकड़ों के आधार पर भारतीय हिमालयी नदी घाटियों में 10 हेक्टेयर से बड़ी 2,431 ग्लेशियल झीलों का अध्ययन किया गया था।
इन झीलों की निगरानी लंबे समय से की जा रही है। बदलते आकार और बढ़ते जलस्तर को संभावित जोखिम से जोड़कर देखा जा रहा है।
सिंधु बेसिन में सबसे ज्यादा 65 झीलें
बढ़ते आकार वाली 130 भारतीय ग्लेशियर झीलों में सबसे अधिक संख्या सिंधु नदी बेसिन में दर्ज की गई है।
अध्ययन के अनुसार, 65 झीलें सिंधु नदी बेसिन में स्थित हैं। इसके अलावा ब्रह्मपुत्र बेसिन में 58 और गंगा बेसिन में सात झीलें शामिल हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार, ग्लेशियरों के पीछे हटने और बर्फ पिघलने से इन झीलों का विस्तार होता है।
कई ग्लेशियर झीलें बर्फ, चट्टानों और मलबे से बने प्राकृतिक बांधों के पीछे स्थित होती हैं।
टूट सकता है प्राकृतिक बांध
हिमालयी क्षेत्रों में भारी बारिश और भूस्खलन ग्लेशियर झीलों के लिए अतिरिक्त खतरा पैदा कर सकते हैं।
चट्टानें या मलबा झील में गिरने से पानी का दबाव तेजी से बढ़ सकता है। इससे प्राकृतिक बांध टूटने की आशंका भी पैदा हो सकती है।
ऐसी स्थिति में बड़ी मात्रा में पानी अचानक नीचे की ओर बह सकता है।
यह स्थिति फ्लैश फ्लड और ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड का कारण बन सकती है।
नेपाल में हाल की तबाही ने भी हिमालयी क्षेत्रों में मौजूद ऐसे जोखिमों पर नई बहस छेड़ दी है।
पूर्वी हिमालय में ग्लेशियर झीलों का क्षेत्रफल तेजी से बढ़ा
2026 के सैटेलाइट अध्ययन में उच्च हिमालयी एशिया की ग्लेशियर झीलों के आकार में लगातार बदलाव दर्ज किया गया।
पूरे उच्च हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियर झीलों का कुल क्षेत्रफल 2016-17 के बाद 5.5 प्रतिशत बढ़ा।
पूर्वी हिमालय में झीलों के विस्तार की स्थिति अधिक चिंताजनक बताई गई है। यहां ग्लेशियर झीलों का क्षेत्रफल करीब 14.1 वर्ग किलोमीटर बढ़ा।
अध्ययन में पूरे उच्च हिमालयी एशिया में 31,698 ग्लेशियर झीलें दर्ज की गईं।
हिमालय में 80 हजार से अधिक भूस्खलन के मामले
ग्लेशियर झीलों के बढ़ते आकार के साथ हिमालय में भूस्खलन का खतरा भी लगातार बना हुआ है।
उपग्रह आधारित आंकड़ों के अनुसार, हिमालयी क्षेत्र में अब तक 80 हजार से अधिक भूस्खलन की घटनाएं दर्ज की जा चुकी हैं।
भारी बारिश, ढलानों में बदलाव और चट्टानों के खिसकने से ग्लेशियर झीलों के प्राकृतिक बांधों पर दबाव बढ़ सकता है।
यही कारण है कि विशेषज्ञ संवेदनशील झीलों की लगातार निगरानी और समय रहते चेतावनी प्रणाली मजबूत करने पर जोर देते हैं।
2,024 ग्लेशियर झीलों की हो रही निगरानी
मानसून के दौरान ISRO विभिन्न हिमालयी क्षेत्रों में ग्लेशियर झीलों की निगरानी कर रहा है।
NHPC की 26 जलविद्युत परियोजनाओं के जलग्रहण क्षेत्रों में स्थित 2,024 ग्लेशियल झीलों पर विशेष नजर रखी जा रही है।
हिमालय में तेजी से बदलते पर्यावरणीय हालात के बीच सैटेलाइट निगरानी को बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
नेपाल की हालिया आपदा के बाद यह सवाल और गंभीर हो गया है कि क्या हिमालयी क्षेत्रों में संभावित ग्लेशियर झील आपदाओं से निपटने की तैयारियां पर्याप्त हैं।
हिमालय में बढ़ती ग्लेशियर झीलें केवल पर्यावरण का मुद्दा नहीं हैं।
इनके आसपास बसे गांवों, सड़कों, जलविद्युत परियोजनाओं और लाखों लोगों की सुरक्षा भी इससे जुड़ी हुई है।















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